भारत 2030 तक सड़कों पर करीब 400 से 500 हाइड्रोजन बसें उतारने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, आने वाले वर्षों में हाइड्रोजन से चलने वाली बसों की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। यह पहल देश में स्वच्छ परिवहन को बढ़ावा देने और पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करने की कोशिश का हिस्सा है।
केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत परिवहन क्षेत्र में हाइड्रोजन आधारित वाहनों के परीक्षण के लिए कई परियोजनाएं शुरू की हैं। जुलाई 2026 में सरकार ने 21 मार्गों पर 70 हाइड्रोजन चालित वाहनों की तैनाती के लिए 12 पायलट परियोजनाओं को मंजूरी दी थी। इनमें 27 बसें और 43 ट्रक शामिल हैं। इन परियोजनाओं के लिए करीब 410.77 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता निर्धारित की गई है।
इससे पहले मार्च 2025 में भी सरकार ने हाइड्रोजन से चलने वाली बसों और ट्रकों के लिए पांच पायलट परियोजनाओं को मंजूरी दी थी। इनमें कुल 37 वाहन शामिल थे, जिनमें 15 हाइड्रोजन ईंधन सेल आधारित वाहन और 22 हाइड्रोजन आंतरिक दहन इंजन आधारित वाहन थे। इनका संचालन देश के अलग-अलग हिस्सों में 10 मार्गों पर किया जाना था।
हाइड्रोजन बसों को खासतौर पर लंबी दूरी और भारी परिवहन वाले क्षेत्रों के लिए उपयोगी विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। ईंधन सेल आधारित हाइड्रोजन वाहन बिजली का इस्तेमाल कर चलते हैं और इनके संचालन के दौरान कार्बन उत्सर्जन काफी कम हो सकता है। हालांकि, इनके बड़े स्तर पर इस्तेमाल के लिए पर्याप्त हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण और ईंधन भरने के केंद्र तैयार करना भी जरूरी होगा।
सरकार ने देश में हरित हाइड्रोजन के उत्पादन को बढ़ाने के लिए भी लक्ष्य तय किया है। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन, इस्तेमाल और निर्यात का प्रमुख केंद्र बनाना है। मंत्रालय के अनुसार, 2030 तक भारत में हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता 50 लाख टन सालाना तक पहुंचाने का लक्ष्य है।
दिल्ली में इस दिशा में वास्तविक इस्तेमाल भी शुरू हो चुका है। मई 2026 में इंडियन ऑयल ने दिल्ली के सेंट्रल विस्टा क्षेत्र में दो हाइड्रोजन चालित बसों की सेवा शुरू की थी। ये बसें सेंट्रल सेक्रेटेरिएट और सेवा तीर्थ मेट्रो स्टेशन के बीच संपर्क उपलब्ध कराने के लिए इस्तेमाल की जा रही हैं।
हालांकि, हाइड्रोजन बसों का विस्तार केवल वाहनों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं होगा। इसके लिए हाइड्रोजन की उपलब्धता, ईंधन भरने के केंद्र, उत्पादन की लागत और वाहनों की तकनीक से जुड़ी चुनौतियों को भी दूर करना होगा। फिलहाल सरकार पायलट परियोजनाओं के जरिए इन पहलुओं की व्यवहारिकता और लागत का आकलन कर रही है।
अगर 2030 तक 400 से 500 हाइड्रोजन बसों का लक्ष्य हासिल होता है, तो सार्वजनिक परिवहन में हाइड्रोजन आधारित वाहनों की मौजूदगी मौजूदा पायलट स्तर से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर दिखाई दे सकती है। आने वाले वर्षों में इन परियोजनाओं से मिलने वाले अनुभव यह तय करने में अहम होंगे कि भारत में हाइड्रोजन बसों का इस्तेमाल किन मार्गों और परिवहन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा किया जा सकता है।