यूं तो समूचा दक्षिण भारत देश-विदेश में पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है, जहाँ अनेकों ऐतिहासिक स्थलों के अलावा ऐसे अनेकानेक मन्दिर हैं जिन्हें पाषाण के मर्मज्ञ शिल्पियों ने कड़ी मेहनत और मनोयोग से एक एक प्रस्तर खण्ड को सुघड़ एवं कलात्मक नक्काशी से सजाकर बनाया है कि, देखनें वाले इनके निर्माताओं से इतने अभिभूत हो जाते हैं कि, इनकी कला की सर्वत्र प्रशंसा करते नहीं अघाते हैं।
दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में एक छोटा सा गांव है ‘हम्पी’, जो कभी कालान्तर में दक्षिण भारत की राजधानी कहलाता था। ‘हम्पी’ में बहने वाली तुंगभद्रा नदी का नाम प्राचीन काल में पम्पा था, और इसी के नाम पर ‘हम्पी’ नगर को दक्षिण के प्रसिद्ध राजा कृष्ण देव राय ने बसाया था, जो उसके विशाल साम्राज्य की राजधानी के रूप में विजयनगर कहलाती थी।
वर्तमान हम्पी गाँव जो कि यहाँ फैले मतंग पर्वत श्रेणियों के मध्य बसा है, अत्यन्त ही आकर्षण का केन्द्र बिन्दु है। छब्बीस वर्ग किलोमीटर में फैला हम्पी गांव ग्रेनाइट की पहाडि़यो से घिरा हुआ है। हम्पी का मुख्य आकर्षण यहाँ स्थित वीरूपाक्ष मन्दिर है। इसका मुख्य द्वार यहाँ आने वाले पर्यटकों को काफी दूरी से ही दिखाई देता है। इस मन्दिर का निर्माण कृष्ण देव राय ने सन् 1510 में करवाया था। वस्तुतः यह एक शिवमन्दिर है, जिसमें प्रतिष्ठित वीरूपाक्षलिंग की पूजा की जाती है। शिल्प व सौन्दर्य की दृष्टि से यह मन्दिर इतना अनूठा है कि इसके भीतरी भाग में बना रंग मंडप व उसकी छत पर बने, सुन्दर भित्ति चित्र तो देखने लायक हैं। मन्दिर में कई छोटे देवालय भी हैं जो 12 वीं व 13 वीं शताब्दी के प्रतीत होते हैं। इन देवालयों में मुख्य रूप से तारकेश्वर, सूर्यनारायण, पातालेश्वर, यथामुक्ति नृसिंह तथा भुवनेश्वरी के है। यह मन्दिर पम्पापति मंदिर के नाम से भी विख्यात है। मंदिर का मुख्य द्वार 52 मीटर ऊंचा है। यहाँ के छोटे से बाजार को पार कर तुंगभद्रा नदी के किनारे-किनारे चलते हुए विशाल विठ्ठल मंदिर के दर्शन होते हैं।
यहाँ पर चारों तरफ प्राचीन मंदिरों के धवस्त खण्डर हैं, जिन्हें देखकर अंदाज लगाया जा सकता है कि इनका अतीत कितना समृद्ध रहा होगा।
विठ्ठल मंदिर, भगवान विष्णु का मंदिर है। इस मन्दिर को देवराय द्वितीय ने अपने शासन काल (1422-1446) के दौरान बनवाया था। इस मंदिर की खासियत यह है कि इसके महामंडपों के स्तम्भों को यदि किसी पत्थर के टुकड़े से बजाया जाय तो इसमें से संगीत के स्वर प्रस्फुटित होते हैं, इसलिए ये "संगीत स्तम्भ" भी कहलाते हैं। इस मंदिर में रखा ‘गरुड़ रथ" आकर्षक है, जो ग्रेनाइट के पत्थर से निर्मित है। रथ को बनाने वाले शिल्प कारीगरों ने लकड़ी के रथ की भांति ही बनाया है रथ में लगे पत्थर के पहिये भी आसानी से धुरी पर घूम सकते हैं। बाजार के निकट ही ‘कडलेकालु’ गणेश मंदिर भी है जिसके भीतर गणेश जी की आदमकद मूर्ति है। यहाँ पर यह ‘चना गणेश’ के नाम से जाने जाते हैं तो पास ही एक अन्य गणेश मंदिर है, जो कि ‘साशिवेकालु’ कहलाते हैं।
हम्पी बाजार में स्थित भव्य कृष्ण मंदिर है, जिसमें कृष्णदेवराय ने उदयगिरी (उड़ीसा) में अपनी विजय पताका फहराने के बाद, अपने साथ लाई बाल-कृष्ण की मूर्ति को स्थापित किया था। सन् 1513 में बने इस मन्दिर में पूजा का प्रावधान नहीं है। यहाँ से और आगे चलने पर ग्रेनाइट से बनी विख्यात लक्ष्मी-नरसिंह की सात मीटर उंची प्रतिमा है, जिसे महाराजा कृष्णदेव राय ने 1528 ई. में बनवाई थी। यह प्रतिमा एक विशाल ग्रेनाइट के पत्थर को तराश कर बनाई गयी है। मूर्ति के बायें भाग में नरसिंह भगवान की गोद में विराजमान लक्ष्मी की मूर्ति तो खण्डित हो चुकी है लेकिन नरसिंह जी की प्रतिमा सात फनों वाले नागदेवता की छत्रछाया में मोहक लगती है। पास में ही एक तीन मीटर ऊंचा शिवलिंग भी गर्भगृह में देखने योग्य है।
यहाँ पन्द्रहवीं शताब्दी में बनाया गया हजाराराम मंदिर भी दर्शनीय है, जिसकी दीवारों पर रामायण के विभिन्न दृश्यों को गढ़ाई से उकेरा गया है। मंदिर के निकट बिखरे खण्डहरों में मर्दाना महल के अवशेष भी हैं। इनमें से एक दशहरा टिब्बा, जो कि 12 मीटर ऊंचा तीन मंजिला चबूतरे की भांति हैं, जहाँ कभी दशहरा के दिन महाराजा सिंहासन पर विराजते थे व उत्सव का लुत्फ उठाते थे। चबूतरा अत्यंत ही कलात्मक चित्रों से युक्त है।
हम्पी का कला वैभव अब पूर्णत्या खण्डहरों के रूप में ही नजर आता है। जिधर नजर दौड़ाओं वहीं आँखो के समक्ष कला के दर्शन होते हैं। मन्दिरों के अलावा यहाँ के कलात्मक महल भी हैं, जिनमें जनाना महल व लोटस महल देखने लायक हैं। पास में ही हाथियों के बांधने के स्थान भी हैं। जो किसी महल से कम नहीं आंके जा सकते हैं। यहाँ पर महारानियों के स्नानागार व एक भोजनशाला भी है। जिसमें पत्थर की पट्टियों में भोजन करने के लिए कटोरे व थालियाँ खुदाई कर बनायी गयी हैं, जिसमें कैदी खाना खाते थे। यहाँ सुन्दर नक्काशी पत्थर से बने कलात्मक दरवाजे भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में देखे जा सकते हैं।
प्रकृति और ऐतिहासिकता के अनूठे संगम के सदृश्य हम्पी में बहने वाली तुंगभ्रदा नदी में टोकरीनुमा नावें दिखाई देती हैं, यहाँ की स्थानीय बोली में इन्हें ‘तेप्पा नावें’ कहा जाता है। 3-4 मीटर व्यास की बॉस से बनी इन नावों के चारों तरफ चमड़ा मंढ़ा होता है। दिखने में भले ही यह मजबूत न हों, पर हैरानी की बात यह है कि इसमें कार तक ढोयी जा सकती है। यहाँ की ग्रेनाइट से बनी चट्टानें दूर-दूर से चमकती नजर आती है. कुछ चट्टानें तो आपस में ऐसी मिली दिखाई देती हैं कि मानों जुड़वां बहने हों, इन चट्टानों को यहाँ आका टांगी गुन्डू कहा जाता हैं।
कुल मिलाकर प्रकृति की गोद में समाया हुआ ‘हम्पी’ अपने अतीत के वैभव पर गर्व कर सकता है लेकिन दुःखद पहलू यह भी साथ जुड़ा हुआ है कि अब यहां के खण्डहरों में बिखरे शिल्प सौदर्य की देखरेख करने वाला कोई नहीं है, लेकिन हम्पी अब भी पर्यटकों को आकर्षित कर रहा है, हम्पी के कमालपूरा गांव में कर्नाटक पर्यटन विकास निगम का होटल है, जिसमें पर्यटकों के ठहरने व खाने की सभी सुविधाएं हैं, ‘हम्पी’ आने के लिए यहां से तेरह किलोमीटर दूर होस्पेट है, जहाँ से दिन भर बसें चलती हैं। चेतन चौहान(सुमन सागर)