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सरकारी योजनाओं में आधार की जगह मतदाता पहचान पत्र लाने की तैयारी? नए प्रस्ताव पर उठे सवाल

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने बायोमेट्रिक जानकारी और मतदाता पहचान पत्र संख्या से लाभार्थियों की पहचान व भुगतान की बात कही, लेकिन सरकार ने अब तक जारी नहीं किया कोई आधिकारिक आदेश

Tanisha Hirawat

नई दिल्ली : सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए अब तक आधार कार्ड को पहचान के प्रमुख दस्तावेज के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। लेकिन केंद्र सरकार में मंत्री राजीव रंजन सिंह के एक बयान ने इस व्यवस्था में बदलाव की संभावना पैदा कर दी है। उन्होंने कहा है कि भविष्य में सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान और उनके खातों में भुगतान के लिए आधार के बजाय मतदाता पहचान पत्र संख्या और बायोमेट्रिक जानकारी का इस्तेमाल किया जाएगा। हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर अभी कई सवाल बने हुए हैं। सरकार ने न तो इसके लागू होने की तारीख बताई है और न ही यह स्पष्ट किया है कि किन योजनाओं पर इसका असर पड़ेगा।

क्या कहा केंद्रीय मंत्री ने?

केंद्रीय पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह, जिन्हें ललन सिंह के नाम से भी जाना जाता है, ने पिछले सप्ताह दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में यह बात कही थी। उन्होंने कहा कि अब लाभार्थियों को भुगतान करने के लिए आधार कार्ड को मुख्य आधार नहीं बनाया जाएगा। उनके अनुसार, आधार कार्ड बनाने की व्यवस्था आसानी से उपलब्ध होने के कारण इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। उन्होंने दावा किया कि अब बहुत कम समय में आधार कार्ड बनवाया जा सकता है।

मंत्री ने कहा कि आगे से लाभार्थियों की पहचान के लिए बायोमेट्रिक जानकारी और मतदाता पहचान पत्र का ईपीआईसी नंबर इस्तेमाल किया जाएगा। मंगलवार को गंगटोक में एक अन्य कार्यक्रम के दौरान भी उन्होंने इस बात को दोहराया। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि यह व्यवस्था किन सरकारी योजनाओं में लागू होगी और इसे किस तरह शुरू किया जाएगा।

अभी नहीं आया कोई आधिकारिक आदेश

मंत्री के बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि क्या केंद्र सरकार सभी कल्याणकारी योजनाओं में आधार की जगह मतदाता पहचान पत्र को अनिवार्य करने जा रही है। लेकिन 5 नवंबर की सुबह तक इस संबंध में कोई आधिकारिक सरकारी आदेश जारी नहीं हुआ था। यह भी साफ नहीं है कि मंत्री केवल अपने मंत्रालयों से जुड़ी योजनाओं की बात कर रहे थे या फिर केंद्र और राज्य सरकारों की सभी योजनाओं में बदलाव की तैयारी है।

यह अंतर इसलिए भी जरूरी है क्योंकि पंचायती राज मंत्रालय के तहत फिलहाल ऐसी कोई योजना नहीं है, जिसमें सीधे किसी व्यक्ति के बैंक खाते में सरकारी राशि भेजी जाती हो। वहीं, मंत्री के पास मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय का भी प्रभार है। इन विभागों की कुछ योजनाओं में लाभार्थियों की पहचान और भुगतान के लिए आधार का इस्तेमाल होता है। उदाहरण के तौर पर राष्ट्रीय पशुधन मिशन की उद्यमिता विकास योजना में लाभ लेने के लिए आधार संख्या का प्रमाण देना या आधार के जरिये पहचान की पुष्टि कराना जरूरी है।

इसके अलावा पीएम-किसान, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण), ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम और राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम जैसी योजनाओं में भी आधार से जुड़े बैंक खातों के माध्यम से भुगतान किया जाता है। राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के तहत बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों को पेंशन दी जाती है। ऐसे में प्रस्ताव का दायरा स्पष्ट होने के बाद ही पता चलेगा कि किन योजनाओं में मौजूदा व्यवस्था बदलेगी।

एसआईआर के बीच क्यों बढ़ी चिंता?

इस बयान का समय भी चर्चा का विषय बन गया है। देश के कई राज्यों में मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर चल रहा है। इस प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से नाम हटने और पात्र लोगों के छूट जाने को लेकर विपक्षी दलों तथा सामाजिक संगठनों ने सवाल उठाए हैं।

ऐसे समय में यदि सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए मतदाता पहचान पत्र अनिवार्य किया जाता है, तो जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हट गए हैं या जिनके दस्तावेजों में गड़बड़ी है, उनके सामने नई परेशानी आ सकती है। खासकर बुजुर्गों, ग्रामीण मजदूरों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए इसका असर गंभीर हो सकता है।

माकपा ने 4 नवंबर को इस प्रस्ताव का विरोध किया। पार्टी ने कहा कि मतदाता पहचान पत्र और बायोमेट्रिक सत्यापन को अनिवार्य बनाने से गरीब और ग्रामीण आबादी के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ लेना मुश्किल हो सकता है। पार्टी ने दावा किया कि कई बुजुर्ग महिलाओं की आंखों की पहचान मशीनों से नहीं हो पाती, जबकि मेहनत-मजदूरी करने वाले लोगों के घिसे हुए अंगूठे के निशान का मिलान भी कई बार नहीं हो पाता। ग्रामीण इलाकों में स्मार्टफोन की कमी भी डिजिटल सत्यापन में बाधा बन सकती है। ये आशंकाएं माकपा की ओर से उठाई गई हैं।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी भी चर्चा में

पश्चिम बंगाल में एसआईआर से जुड़े एक मामले में जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा था कि मतदाता सूची से नाम हटने के बावजूद व्यक्ति राशन जैसी कुछ सरकारी सुविधाओं का हकदार रह सकता है। यह टिप्पणी मोहिबुल्ला मंडल की याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई थी। अदालत ने उन्हें अपनी शिकायत लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट जाने की छूट दी थी। यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह उस सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणी थी, न कि सभी कल्याणकारी योजनाओं पर लागू कोई अलग अंतिम आदेश।

दूसरी ओर, आधार कानून की धारा 7 में भी यह व्यवस्था है कि जिन लोगों को आधार संख्या नहीं मिली है, उन्हें सरकारी लाभ देने के लिए पहचान का दूसरा उचित विकल्प उपलब्ध कराया जाना चाहिए। केंद्र सरकार ने 2018 में संसद में दी गई जानकारी में भी कहा था कि आधार नहीं होने की स्थिति में मतदाता पहचान पत्र, पैन कार्ड, पासपोर्ट और अन्य दस्तावेजों के आधार पर लाभ दिया जा सकता है। यानी मौजूदा कानून में भी कुछ परिस्थितियों में वैकल्पिक पहचान का प्रावधान है।

अब किन सवालों के जवाब जरूरी?

मंत्री के बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आधार को पूरी तरह हटाया जाएगा या केवल कुछ योजनाओं में पहचान की नई व्यवस्था लागू होगी। दूसरा सवाल यह है कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची में नहीं हैं, उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ कैसे मिलेगा। इसके अलावा बायोमेट्रिक सत्यापन में तकनीकी परेशानी आने पर वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी, यह भी स्पष्ट करना होगा।

सरकारी योजनाओं का उद्देश्य जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचाना है। इसलिए पहचान की नई व्यवस्था बनाते समय यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि दस्तावेजों या तकनीकी दिक्कतों के कारण कोई पात्र व्यक्ति अपने अधिकार से वंचित न रह जाए। फिलहाल मंत्री का बयान प्रस्तावित बदलाव का संकेत देता है, लेकिन अंतिम तस्वीर सरकारी आदेश और योजना-वार दिशा-निर्देश जारी होने के बाद ही साफ होगी।

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