सुनवाई के दौरान मेडिकल बोर्ड ने अदालत को बताया कि गर्भ की अवधि लगभग 28 सप्ताह है और भ्रूण का अनुमानित वजन करीब एक किलोग्राम हो सकता है। बोर्ड के अनुसार, इस अवस्था में शिशु के जीवित रहने की संभावना लगभग 80 प्रतिशत है। हालांकि, समय से पहले जन्म लेने पर उसे आंखों की बीमारी, आंतों की गंभीर समस्या, मस्तिष्क में रक्तस्राव और सांस लेने में कठिनाई जैसी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। बोर्ड ने यह भी कहा कि 34 सप्ताह के आसपास इन जोखिमों में कमी आती है तथा रक्त संबंध होने के कारण कुछ अतिरिक्त चिकित्सकीय जटिलताओं की आशंका भी है।
न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन ने कहा कि मेडिकल बोर्ड की राय महत्वपूर्ण है, लेकिन दुष्कर्म पीड़िता की मानसिक स्थिति और गर्भावस्था से होने वाले आघात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि पीड़िता गर्भ जारी नहीं रखना चाहती, इसलिए उसकी याचिका स्वीकार की जानी चाहिए।
उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि यदि चिकित्सकीय प्रक्रिया के बाद शिशु जीवित रहता है तो राज्य सरकार उसे आवश्यक नवजात चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराए। यदि पीड़िता बच्चे को अपने साथ नहीं रखना चाहती, तो किशोर न्याय अधिनियम के तहत उसे बाल देखभाल संस्था या मान्यता प्राप्त गोद लेने वाली एजेंसी को सौंपा जा सकता है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि प्रक्रिया के दौरान शिशु की मृत्यु होने पर डीएनए जांच के लिए भ्रूण के ऊतक और रक्त के नमूने सुरक्षित रखे जाएं, क्योंकि मामले में यौन उत्पीड़न की प्राथमिकी दर्ज है। यह आदेश पीड़िता के पिता की याचिका पर पारित किया गया।