यह खबर अभूतपूर्व होने के साथ चौंकाने वाली है, क्योंकि देश इस समय इसरो के बूते लगातार वैश्विक ऊंचाइयां छू रहा है।
देश की सबसे प्रतिष्ठित संस्था ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन‘ प्रतिभा पलायन के जबरदस्त संकट से जूझ रही है। यह खबर अभूतपूर्व होने के साथ चौंकाने वाली है, क्योंकि देश इस समय इसरो के बूते लगातार वैश्विक ऊंचाइयां छू रहा है। इसरो ने अंतरिक्ष में एक साथ 104 उपग्रह प्रक्षेपित करके विश्व कीर्तिमान बनाया हुआ है। पहले चरण के मंगल और चंद्र अभियान भारत पूरे कर चुका है। गगनयान के अलावा चंद्रयान-4, मंगलयान-2 और अंतरिक्ष में अपना अड्डा बनाने की तैयारी के साथ, इतिहास बदलने वाली अनेक परियोजनाओं का काम हो रहा है। ऐसे में कुछ माह के भीतर 100 से 120 विज्ञानियों द्वारा नौकरी छोड़ने और अनिवार्य सेवानिवृत्ति के बढ़ते मामलों ने भारत सरकार समेत देश को बेचैन किया हुआ है। इस स्थिति को अंतरिक्ष के क्षेत्र में उदारीकरण की नीति बनाकर निजी उद्यमिता के प्रवेश को बड़ा कारण माना जा रहा है।
हालांकि केंद्र सरकार ने नौकरी छोड़ने और सेवानिवृत्ति के नियमों को कड़ा कर दिया है। अब वैज्ञानिक अधूरी परियोजना छोड़कर नहीं जा सकते हैं।
हालांकि केंद्र सरकार ने नौकरी छोड़ने और सेवानिवृत्ति के नियमों को कड़ा कर दिया है। अब वैज्ञानिक अधूरी परियोजना छोड़कर नहीं जा सकते हैं। दरअसल अंतरिक्ष विभाग द्वारा जारी एक आंतरिक ज्ञापन से पता चला है कि अब गगनयान और अन्य महत्वपूर्ण अभियानों से जुड़े ‘ग्रुप-ए‘ के विज्ञानी और तकनीकि कर्मियों के त्यागपत्र व स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के अवेदनों को एकाएक स्वीकार नहीं किया जाएगा। नए नियमों के तहत अब ऐसे सभी अनुरोधों को अंतिम निर्णय के लिए पहले अंतरिक्ष विभाग के पास अनुमोदन हेतु भेजा जाएगा। यह फैसला जल्दबाजी में लिए वर्ष-2020 के उस नियम को बदलता है, जिसमें संबंधित केंद्रों के निदेशकों को त्यागपत्र स्वीकारने का अधिकार था।
वर्तमान में 400 से अधिक पंजीकृत स्पेस स्टार्टअप्स सक्रिय हैं, जिन्हें करोड़ों रुपए की आर्थिक मदद मिल रही है, चूंकि निजी क्षेत्र के पास अंतरिक्ष विज्ञान संबंधी पुराना कोई संस्थागत ढांचा नहीं है, इसलिए वे सरकारी विज्ञान संस्थाओं के प्रशिक्षित और अनुभवी वैज्ञानिकों को भारी वेतन और आकर्षक सुविधाएं देकर ललचा रही हैं, इस कारण प्रतिभा पलायन बढ़ गया है। इस स्थिति से इसरो काे बड़ा झटका लगा है।
प्रतिभा पलायन की स्थिति निजी स्पेस स्टार्टअप में बढ़ते आकर्षण के चलते बनी है। सबसे अधिक इस्तीफे बैंग्लुरु के यूआर राव सैटेलाइट सेंटर और तिरुअनंतपुरम के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर से हुए हैं। इस पलायन का प्रमुख कारण भारत का तीव्रता से उभरता निजी अंतरिक्ष क्षेत्र है। मीडिया रिपार्टों की मानें तो इस समय इसरो न केवल मानव-शक्ति की कमी से जूझ रहा है, बल्कि हाल ही में पीएसएलवी के लगातार दो असफल अभियानों जैसी तकनीकी चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। बावजूद यह अच्छी बात है कि इसरो का आत्मबल डगमगाया नहीं है। इसरो प्रमुख वी. नारायण का कहना है कि ‘लोगों का आना-जाना संगठनों में बना रहता है, बावजूद हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि देश के प्रमुख प्रोजेक्ट अचानक प्रभावित न हों। इस स्थिति को संभालने के लिए तैयारी में लगे हैं।‘ दरअसल केंद्र सरकार के प्रोत्साहन और नियमों में शिथिलता बरतने के चलते भारत में निजी अंतरिक्ष कंपनियां और स्टार्टअप्स की बाढ़ सी आई हुई है। वर्तमान में 400 से अधिक पंजीकृत स्पेस स्टार्टअप्स सक्रिय हैं, जिन्हें करोड़ों रुपए की आर्थिक मदद मिल रही है, चूंकि निजी क्षेत्र के पास अंतरिक्ष विज्ञान संबंधी पुराना कोई संस्थागत ढांचा नहीं है, इसलिए वे सरकारी विज्ञान संस्थाओं के प्रशिक्षित और अनुभवी वैज्ञानिकों को भारी वेतन और आकर्षक सुविधाएं देकर ललचा रही हैं, इस कारण प्रतिभा पलायन बढ़ गया है। इस स्थिति से इसरो का बड़ा झटका लगा है।
यह भी उम्मीद की गई थी कि इससे बड़ी संख्या में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। किंतु बाद में पता लगा कि निजी स्टार्टअप भारत सरकार की पूर्व से स्थापित कंपनियों में ही सेंध लगाकर वैज्ञानिकों को लुभा रहे हैं। यही नहीं भविष्य में ये स्टार्टअप सरकारी संस्थाओं के व्यापार में भी सेंध लगाने का काम करेंगे।
हालांकि भारत ने जब अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में निजी उद्यमिता के प्रवेश की शुरुआत की थी, तब इसे बड़ी उपलब्धि के साथ अंतरिक्ष, संचार व सामरिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता का बड़ा कारण माना गया था। यह भी उम्मीद की गई थी कि इससे बड़ी संख्या में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। किंतु बाद में पता लगा कि निजी स्टार्टअप भारत सरकार की पूर्व से स्थापित कंपनियों में ही सेंध लगाकर वैज्ञानिकों को लुभा रहे हैं। यही नहीं भविष्य में ये स्टार्टअप सरकारी संस्थाओं के व्यापार में भी सेंध लगाने का काम करेंगे। ये भविष्य में अंतिरक्ष में उपग्रह छोड़ने और अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित होने के बाद यात्रियों को घुमाने के काम से बहुत आगे नहीं बढ़ पाएंगे, जिससे तात्कालिक लाभ मिलता रहे। नए शोध और अनुसंधानों में भी नवीन स्टार्टअपों की रुचि कम ही दिखाई देगी।
देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा क्षेत्र में अंतरिक्ष विज्ञान की भागीदारी बढ़ाने की दृष्टि से 2020 में दो नवीन नीतियां वजूद में लाई गईं थीं। इस हेतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय अंतरिक्ष संगठन यानी इंडियन स्पेस एसोसिएशन (आईएसपीए) का शुभारंभ किया था। इसके तहत स्पेस कॉम (अंतरिक्ष श्रेणी) और रिमोट सेंसिंग (सुदूर संवेदन) नीतियां बनाई गईं थीं। इन नीतियों से स्पेस और रिमोट क्षेत्रों में निजी और सरकारी भागीदारी के द्वार खोल दिए गए थे। वर्तमान में ये दोनों उद्यम ऐसे माध्यम हैं,जिनमें सबसे ज्यादा रोजगार की उम्मीद की गई थी,
2020 में केंद्र सरकार द्वारा अंतरिक्ष उद्योग को निजी क्षेत्र के लिए खोले जाने के बाद इसने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम में कदम रखा था। स्काईरूट भारत की पहली निजी क्षेत्र की ऐसी कंपनी बन गई थी, जिसने दो घरेलू और एक विदेशी ग्राहक के तीन पेलोड अंतरिक्ष में स्थापित किए थे। देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा क्षेत्र में अंतरिक्ष विज्ञान की भागीदारी बढ़ाने की दृष्टि से 2020 में दो नवीन नीतियां वजूद में लाई गईं थीं। इस हेतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय अंतरिक्ष संगठन यानी इंडियन स्पेस एसोसिएशन (आईएसपीए) का शुभारंभ किया था। इसके तहत स्पेस कॉम (अंतरिक्ष श्रेणी) और रिमोट सेंसिंग (सुदूर संवेदन) नीतियां बनाई गईं थीं। इन नीतियों से स्पेस और रिमोट क्षेत्रों में निजी और सरकारी भागीदारी के द्वार खोल दिए गए थे। वर्तमान में ये दोनों उद्यम ऐसे माध्यम हैं,जिनमें सबसे ज्यादा रोजगार की उम्मीद की गई थी, क्योंकि घरेलू उपकरण, रक्षा संबंधी, संचार व दूरसंचार सुविधाएं, हथियार और अंतरिक्ष उपग्रहों से लेकर रॉकेट और मिसाइल ऐसी ही तकनीक से संचालित हैं, जो रिमोट से संचालित और नियंत्रित होते हैं। चंद्र, मंगल और गगनयान भी इन्हीं प्रणालियों से संचालित होते हैं। अंतरिक्ष-यात्रा (स्पेस टूरिज्म) के अवसर भी बढ़ रहे हैं। भारत में इस अवसर को बढ़ावा देने के लिए निजी स्तर पर बड़ी मात्रा में निवेश की जरूरत पड़ेगी। इस हेतु नीतियों में बदलाव की आवश्यकता लंबे समय से अनुभव की जा रही थी। 20 जुलाई 2021 को ब्लू ओरिजन कंपनी ने न्यू शेफर्ड कैप्सूल से चार यात्रियों को अंतरिक्ष की यात्रा कराई थी। ऐसी यात्राओं का सिलसिला आम लोगों के लिए कीमत वसूल कर बड़ी कमाई का माध्यम बनने जा रहे हैं।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की तकनीकों को निजी और विदेशी क्षेत्र की कंपनियों को हस्तांतरित करने की नीति भी बन चुकी है। इसरो ने इस नाते कीमत वसूल कर तकनीक हस्तांतरण शुरू भी कर दिया है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की तकनीकों को निजी और विदेशी क्षेत्र की कंपनियों को हस्तांतरित करने की नीति भी बन चुकी है। इसरो ने इस नाते कीमत वसूल कर तकनीक हस्तांतरण शुरू भी कर दिया है। अंतरिक्ष सुधारों के तहत इसरो ने पुनः संशोधित प्रौद्योगिकी हस्तांतरण नीति-2020 जारी की थी। इसमें पहली बार विदेशी फर्म को भी प्रत्यक्ष रूप से इसरो ने तकनीकी हस्तांतरित करने की छूट दी है। दरअसल इसरो के पास 500 से अधिक ऐसी तकनीक हैं, जिसमें से 400 निजी क्षेत्र की 233 भारतीय तकनीकें कंपनियों के पास हैं। यानी नए स्टार्टअप, नवीन अनुसंधान करके नई तकनीक और उपकरण बनाने की विधि हासिल करने के बजाय इसरो से शुल्क चुकाकर तकनीक हस्तांतरित कर अपना काम आगे बढ़ाएंगे।
...लेकिन इसरो के वैज्ञानिकों को ही प्रलोभन देकर निजी संस्थान में नई नौकरी के लिए बुला लेना, इस बात का संकेत है कि भविष्य में इसरो के अलावा डीआरडीओ जैसी जो बड़ी सरकारी संस्था हैं, उनमें भी सेंघ लगाई जा सकती है।
भारत ने जब अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में निजी कंपनियों के लिए द्वार खोलकर छूट का प्रस्ताव लागू किया था, तभी अनेक प्रकार के संदेह प्रकट किए गए थे। विशेषज्ञों की दलील थी कि इससे इसरो की गोपनीयता भंग होगी और तकनीक चोरी होने का खतरा बढ़ जाएगा। गोपनीयता भंग होने और तकनीक चोरी होने के मामले तो सामने नहीं आए हैं, लेकिन इसरो के वैज्ञानिकों को ही प्रलोभन देकर निजी संस्थान में नई नौकरी के लिए बुला लेना, इस बात का संकेत है कि भविष्य में इसरो के अलावा डीआरडीओ जैसी जो बड़ी सरकारी संस्था हैं, उनमें भी सेंघ लगाई जा सकती है। याद रहे जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, तब बीएसएनएल के ही नेटवर्क में सेंध लगाकर निजी दूर संचार कंपनियां खड़ी हुई थीं। आज भारत संचार निगम लिमिटेड किस हाल में है, इसकी दुर्दशा इसकी खंडहरों में बदलते आलीशान भवनों में देखी जा सकती है। अभी तक अंतरिक्ष के क्षेत्र में इसरो का एकाधिकार था, जो कालांतर में बीएसएनएल की तरह टूटता दिखाई दे रहा है।
प्रमोद भार्गव
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं। )