जल प्रलय 
भारत

तिब्बत के सैलाब से नेपाल में जल प्रलय

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे विकसित नगर सिंधु व रावी नदियों के तट पर थे। इन्हीं नदियों से बढ़ती आबादी को शुद्ध पानी दिया गया और हिमालय में बांध बनाए गए। आरंभ में यह विकास धीमा था और विकास को आगे बढ़ाने के लिए हिमालय में कोई भू-गर्भीय खुदाई नहीं की गई थी। किंतु आगे चलकर भोग और उपभोक्तावादी संस्कृति को विकास का पैमाना मान लिया गया। नतीजतन सरस्वती और दृष्द्वती नदी क्षेत्र में बर्फ के बड़े-बड़े शिलाखंड गिरने से बाढ़ ने समूचे ब्रह्मावर्त और आर्यावर्त में प्रलय ला दिया।

भारतीय दर्शन के अनुसार मानव सभ्यता का विकास हिमालय और उसकी नदी-घाटियों से माना जाता है। ऋषि-कश्यप और उनकी दिति-अदिति नाम की पत्नियों से मनुष्य की उत्पत्ति हुई । फिर देव, असुर और मानव के विकासक्रम का सिलसिला शुरू हुआ । सिंधु और सारस्वत सभ्यता के विकास क्रम की शुरुआत हुई। इस विकसित क्षेत्र को आर्यावर्त कहा जाता था, जो आर्याना से लेकर नेपाल और सप्त सिंधु क्षेत्र तक फैला था। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे विकसित नगर सिंधु व रावी नदियों के तट पर थे। इन्हीं नदियों से बढ़ती आबादी को शुद्ध पानी दिया गया और हिमालय में बांध बनाए गए। आरंभ में यह विकास धीमा था और विकास को आगे बढ़ाने के लिए हिमालय में कोई भू-गर्भीय खुदाई नहीं की गई थी। किंतु आगे चलकर भोग और उपभोक्तावादी संस्कृति को विकास का पैमाना मान लिया गया। नतीजतन सरस्वती और दृष्द्वती नदी क्षेत्र में बर्फ के बड़े-बड़े शिलाखंड गिरने से बाढ़ ने समूचे ब्रह्मावर्त और आर्यावर्त में प्रलय ला दिया। इतने बड़े रूप में सृष्टि के विनाश की यह बड़ी घटना थी, जिसका उल्लेख सभी धर्मों के ग्रंथों में मिलता है। नेपाल की तबाही को ऐसी ही प्रलय का कारण माना जा रहा है, क्योंकि इस प्रलय का कारण केवल बारिश नहीं है।

नेपाल और चीन की सीमा पर हिमखंड का बड़ा हिस्सा टूट गया। इसके मलबे ने ल्हेंदे नदी के जल प्रवाह का मार्ग रोक दिया। अतएव जल के भंडारण से एक अस्थायी झील का निर्माण हो गया। पानी के भारी दबाव के चलते झील फूट गई। इसके फूटते ही पानी बर्फ की शिलाएं और मलबे का तेज सैलाब नीचे आया।

नेपाल की इस त्रासदी के मूल में एक के बाद एक तीन मिनट के अंतराल से घटी दो घटनाएं हैं। हिमालय के तिब्बत क्षेत्र में सुबह 8.37 बजे 4.4 तीव्रता का भूकंप आया। नेपाल और चीन की सीमा पर हिमखंड का बड़ा हिस्सा टूट गया। इसके मलबे ने ल्हेंदे नदी के जल प्रवाह का मार्ग रोक दिया। अतएव जल के भंडारण से एक अस्थायी झील का निर्माण हो गया। पानी के भारी दबाव के चलते झील फूट गई। इसके फूटते ही पानी बर्फ की शिलाएं और मलबे का तेज सैलाब नीचे आया। करीब 8.40 बजे भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में बाढ़ आ गई। इससे रसुवा और नुवाकोट के एक दर्जन से ज्यादा इलाके प्रभावित हुए। इतनी ही जल विद्युत परियोजनाएं नष्ट हो गईं। कई लोगों के मरने की खबर है और करीब 1000 लोग लापता हैं। कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर निकले भारतीय यात्री संकट में हैं। इस त्रासदी को 2013 में उत्तराखंड के केदारनाथ घाटी में आए जल प्रलय का पर्याय माना जा रहा है।

मौसम और प्राकृतिक आपदाओं की जानकारी देने वाले उपग्रह चाहे जितने आधुनिक तकनीक से जुड़े हों, वे अनियमित हो चुके मौसम के चलते बादलों के फटने, हिमखंडों के टूटने और भारी बारिश होने की क्षेत्रवार जानकारी देने में अब तक असमर्थ ही रहे हैं।

दरअसल वर्तमान में समूचा हिमालयी क्षेत्र आधुनिक विकास और जलवायु परिवर्तन के खतरों से दो-चार हो रहा है। मौसम और प्राकृतिक आपदाओं की जानकारी देने वाले उपग्रह चाहे जितने आधुनिक तकनीक से जुड़े हों, वे अनियमित हो चुके मौसम के चलते बादलों के फटने, हिमखंडों के टूटने और भारी बारिश होने की क्षेत्रवार जानकारी देने में अब तक असमर्थ ही रहे हैं। इसीलिए 2013 में केदारनाथ प्रलय, 2014 में दुनिया का स्वर्ग माने जाने वाले जम्मू-कश्मीर राज्य की नदियों की बाढ़ से नरक में बदल जाने के संकेत नहीं मिल पाए थे। वर्षा की तीव्रता ऐसी मुसीबत बनी थी कि देखते-देखते स्वर्ग की धरती पर इठलाती-बलखाती नदियां झेलम, चिनाब और तवी ने अपनी प्रकृति बदलकर रौद्र रूप धारण कर लिया था। राज्य का जर्रा-जर्रा विनाश की कुरूपता में तब्दील हो गया था। अलगाववाद का प्रपंच अलापने में लगी राज्य सरकार का तंत्र पंगु हो गया था। तब सेना की मदद से इस भीषण त्रासदी से पार पाना संभव हो पाया था। इसी तरह 2021 में नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान के निकट हिमखंड के टूटने से ताबाही मची थी। इससे धौलीगंगा नदी में अचानक बाढ़ आई और तपोवन विष्णुगाड पनबिजली परियोजना में काम कर रहे अनेक मजदूर काल के गाल में समा गए थे। हिमाचल प्रदेश में भी भू-स्खलन, बादल फटने और भारी बारिश से तबाही देखने में आ रही है। नेपाल की ल्हेंदे नदी में 14 माह के भीतर दूसरी बार बाढ़ आई है। आठ जुलाई 2025 की बाढ़ को नेपाल के मौसम विभाग ने उपग्रह से ली तस्वीरों के आधार पर हिमनदों के फटने से जोड़ा था। इस बार भी त्रासदी की यही प्रमुख वजह मानी जा रही है। समूची दुनिया में मौसम से जुड़ी तकनीकें सटीक जानकारी नहीं दे पा रही हैं।

हकीकत में तबाही के असली कारण समूचे हिमालय क्षेत्र में बीते एक दशक से पर्यटकों के लिए सुविधाएं जुटाने के परिप्रेक्ष्य में जल विद्युत संयंत्र और रेल परियोजनाओं की जो बाढ़ आई हुई है, वह है।

मौसम विज्ञानी जता रहे हैं कि मानसून में रुकावट आ जाने से बादल पहाड़ों पर इकट्ठे हो जाते हैं और यही मूसलाधार बारिश और हिमखंड टूटने का कारण बनते हैं। यह तबाही इसी का परिणाम है। तबाही के कारण मानसून पर डालकर जिम्मेवार जवाबदेही से नहीं बच सकते। केदारनाथ में बिना मानसून के रुकावट के ही तबाही आ गई थी। अतएव यह कहना बेमानी है कि मानसून की रुकावट तबाही में बदली । हकीकत में तबाही के असली कारण समूचे हिमालय क्षेत्र में बीते एक दशक से पर्यटकों के लिए सुविधाएं जुटाने के परिप्रेक्ष्य में जल विद्युत संयंत्र और रेल परियोजनाओं की जो बाढ़ आई हुई है, वह है। इन योजनाओं के लिए हिमालय क्षेत्र में रेल गुजारने और कई हिमालयी छोटी नदियों को बड़ी नदियों में डालने के लिए सुरंगें निर्मित की जा रही हैं। बिजली परियोजनाओं के लिए भी जो संयंत्र लग रहे हैं, उनके लिए हिमालय को खोखला किया जा रहा है। इस आधुनिक औद्योगिक और प्रौद्योगिकी विकास का ही परिणाम है कि आज हिमालय ही नहीं, हिमालय के शिखरों पर स्थित पहाड़ दरकने लगे हैं, जिन पर हजारों साल से मानव बसाहटें अपनी ज्ञान-परंपरा के बूते जीवन-यापन करने के साथ हिमालय और वहां रहने वाले अन्य जीव-जगत की भी रक्षा करते चले आ रहे हैं। हिमालय और पृथ्वी सुरक्षित बने रहें, इस दृष्टि से कृतज्ञ मनुष्य ने अथर्ववेद में लिखे पृथ्वी-सूक्त में अनेक प्रार्थनाएं की हैं। इस सूक्त में राष्ट्रीय आवधारणा एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को विकसित, पोषित एवं फलित करने के लिए मनुष्य को नीति और धर्म से बांधने की कोशिशें की हैं। लेकिन हमने कथित भौतिक सुविधाओं के लिए अपने आधार को ही नष्ट करने का काम आधुनिक विकास के बहाने कर दिया । पहाड़ों में अतिवृष्टि के चलते हिमखंड और नदियों में झीलें अस्तित्व में आ जाती हैं। नेपाल त्रासदी की घटना में हिमखंड टूटने से झील का बनना और टूटना हैं। हिमालय में झील, तालाब और हिमनदों का बनना एक आश्चर्यजनक किंतु स्वाभाविक प्रक्रिया है।

नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनडीएमए) ने उत्तराखंड में 13 हिमनदों को खतरनाक श्रेणी के रूप में चिह्नित किया है। इनमें से पांच को उच्च संकट की श्रेणी में रखा है।

इस आपदा ने यह जरूर जता दिया है कि नेपाल से लेकर उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों के खतरे बढ़ रहे है। राज्य में करीब 1266 ऐसी झीलें हैं। नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनडीएमए) ने उत्तराखंड में 13 हिमनदों को खतरनाक श्रेणी के रूप में चिह्नित किया है। इनमें से पांच को उच्च संकट की श्रेणी में रखा है। हालांकि यह मुद्दा कोई नया नहीं है। 2013 में केदारनाथ जल प्रलय के बाद यह मुद्दा महत्वपूर्ण हो गया था। क्योंकि चैड़ाबाड़ी ग्लेशियर झील के फटने से केदारनाथ में भीषण तबाही आई थी। इसके बाद से ही उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित हिमनदों की निगरानी और इनसे बचाव के लिए अध्ययन करने की दिशा में पहल की गई थी, लेकिन अध्ययन के क्या निष्कर्ष निकले और उनके अनुरूप समस्या से निपटने के क्या उपाय किए गए इस दिशा में कोई पारदर्शी जानकारी नहीं है।

प्रमोद भार्गव (लेखक/पत्रकार)

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