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पेट्री डिश से चरागाह तक पहुंची असम की ‘लखीमी’

देशी नस्ल के संरक्षण की दिशा में बड़ी कामयाबी IVF से दुनिया की पहली लखीमी बछिया का जन्म

गुवाहाटी: असम ने पशुधन जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। असम वेटरिनरी एंड फिशरीज यूनिवर्सिटी (AVFU) के वैज्ञानिकों ने देशी लखीमी नस्ल की दुनिया की पहली IVF से जन्मी मादा बछिया तैयार की है। करीब एक सप्ताह की यह बछिया फिलहाल विश्वविद्यालय के जैव-सुरक्षित परिसर में निगरानी में है और पूरी तरह स्वस्थ बताई जा रही है। इस उपलब्धि की जानकारी मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी साझा की थी।

प्रयोगशाला में शुरू हुई जिंदगी

इस बछिया के जन्म की कहानी प्राकृतिक प्रजनन से अलग है। वैज्ञानिकों ने एक शुद्ध लखीमी नस्ल की गाय से अंडाणु और शुद्ध लखीमी सांड से वीर्य लिया। दोनों को IVF प्रयोगशाला में मिलाकर भ्रूण तैयार किया गया। प्रयोगशाला में करीब सात दिन तक विकसित किए गए भ्रूण को इसके बाद एक सरोगेट गाय के गर्भ में प्रत्यारोपित किया गया। इसके बाद गर्भावस्था सामान्य तरीके से आगे बढ़ी और निर्धारित अवधि के बाद बछिया का जन्म हुआ। यानी उसके जीवन के शुरुआती सात दिन प्रयोगशाला में विकसित हुए, जबकि बाकी गर्भकाल उसने सरोगेट गाय के गर्भ में पूरा किया।

क्यों खास है लखीमी नस्ल?

लखीमी असम की देशी पशु नस्ल है और स्थानीय किसानों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस नस्ल में रोग प्रतिरोधक क्षमता और गर्मी सहने की बेहतर क्षमता है। असम जैसे गर्म और आर्द्र वातावरण में इन विशेषताओं का खास महत्व है। हालांकि प्राकृतिक प्रजनन और क्रॉस-ब्रीडिंग के कारण समय के साथ किसी देशी नस्ल की मूल आनुवंशिक विशेषताएं कमजोर या मिश्रित हो सकती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि IVF और भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक के जरिए शुद्ध लखीमी आनुवंशिक गुणों को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।

एक गाय से कई संतानों की संभावना

IVF तकनीक का एक बड़ा फायदा यह है कि किसी उत्कृष्ट पशु के आनुवंशिक गुणों को तेजी से आगे बढ़ाया जा सकता है। एक प्रजनन चक्र में कई भ्रूण तैयार कर उन्हें अलग-अलग सरोगेट गायों में प्रत्यारोपित किया जा सकता है। इससे एक उत्कृष्ट पशु की आनुवंशिक क्षमता को कम समय में कई संतानों तक पहुंचाने की संभावना बनती है। AVFU की IVF प्रयोगशाला के प्रभारी डॉ. मन्ना बरूटी के अनुसार, अब तक टीम ने करीब 182 भ्रूण तैयार किए हैं, जिनमें लगभग 81 भ्रूण सरोगेट गायों में प्रत्यारोपित किए जा चुके हैं। इनसे करीब 37 गर्भधारण हुए हैं। आने वाले समय में लगभग 30 और IVF बछड़ों के जन्म की उम्मीद जताई गई है।

2023 में शुरू हुआ था प्रोजेक्ट

यह परियोजना वर्ष 2023 में केंद्र सरकार के राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत विश्वविद्यालय को मिली थी। इसका उद्देश्य देशी पशु नस्लों का संरक्षण, उत्कृष्ट भ्रूणों को किसानों तक पहुंचाना और बेहतर नस्ल के सांडों को कृत्रिम गर्भाधान के लिए उपलब्ध कराना है। परियोजना का उद्घाटन 11 अक्टूबर 2025 को किया गया था।

किसानों को भी मिलेगा फायदा

वैज्ञानिकों की योजना केवल प्रयोगशाला में IVF बछड़े पैदा करने तक सीमित नहीं है। आगे चयनित और बेहतर आनुवंशिक गुण वाले भ्रूण किसानों को उपलब्ध कराने की योजना है। इससे बेहतर पशुधन तैयार होने, दूध उत्पादन क्षमता बढ़ने और लंबे समय में पशुपालकों की आय में सुधार की उम्मीद है। फिलहाल छोटी-सी लखीमी बछिया वैज्ञानिकों की निगरानी में है। लेकिन उसका जन्म असम के लिए एक बड़े प्रयोग की शुरुआत माना जा रहा है—जहां आधुनिक IVF तकनीक के जरिए राज्य की पारंपरिक देशी नस्ल को संरक्षित करने और उसकी आनुवंशिक क्षमता को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।

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