बिना कोई कारण बताए औद्योगिक कच्चे माल की आवाजाही पर रोक; उत्पादन, रोजगार और देश की अर्थव्यवस्था पर गंभीर संकट
सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : पश्चिम बंगाल की सीमाओं पर औद्योगिक परिवहन को लेकर एक अत्यंत चिंताजनक स्थिति उत्पन्न हो गई है। Raw Petroleum Coke (RPC) जैसे महत्वपूर्ण औद्योगिक उत्पादों को लेकर जा रहे सैकड़ों ट्रक पिछले 45 दिनों से भी अधिक समय से सरकारी अधिकारियों द्वारा रोके गए हैं। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इस रोक का आज तक कोई स्पष्ट कारण या लिखित आदेश संबंधित उद्योगों और परिवहनकर्ताओं को नहीं बताया गया है।
इससे भी अधिक आश्चर्यजनक स्थिति यह है कि बार-बार पूछताछ के बावजूद यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि आखिर किसके आदेश पर इन ट्रकों की आवाजाही रोकी गई है। उद्योगपति और ट्रांसपोर्टर लगातार अधिकारियों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन उन्हें न कोई संतोषजनक जवाब मिल रहा है और न ही यह बताया जा रहा है कि यह प्रतिबंध कब समाप्त होगा।
इसका प्रभाव अब केवल परिवहन व्यवसाय तक सीमित नहीं रह गया है। RPC से CPC का निर्माण होता है और CPC का उपयोग Graphite Electrodes के निर्माण में होता है, जो इस्पात उद्योग के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। इसी प्रकार ये उत्पाद Aluminium एवं अन्य महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्रों के लिए भी आवश्यक हैं। कच्चे माल की आपूर्ति बाधित होने से देशभर के कई उद्योगों का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। अनेक औद्योगिक इकाइयां बंद होने की कगार पर पहुंच रही हैं। इससे न केवल कंपनियों को भारी आर्थिक नुकसान होगा, बल्कि हजारों श्रमिकों और उनके परिवारों के सामने बेरोजगारी का संकट खड़ा हो सकता है। घरेलू आपूर्ति एवं निर्यात प्रतिबद्धताएं भी प्रभावित होंगी, जिससे देश को बहुमूल्य विदेशी मुद्रा का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
इस संकट का प्रभाव उत्तर-पूर्व भारत की तेल रिफाइनरियों पर भी पड़ रहा है। औद्योगिक उप-उत्पादों की निकासी नहीं हो पाने के कारण उनका भंडारण लगातार बढ़ रहा है, जिससे रिफाइनरियों के सामने गंभीर स्टोरेज संकट उत्पन्न हो रहा है और उनके सामान्य परिचालन पर भी खतरा मंडराने लगा है। विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इनमें से अधिकांश औद्योगिक सामग्री सरकारी क्षेत्र की तेल कंपनियों एवं रिफाइनरियों से खरीदी गई है तथा उनके साथ सभी आवश्यक वैध दस्तावेज उपलब्ध हैं। इसके बावजूद इनकी आवाजाही रोकना अनेक गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
ट्रक संचालकों का कहना है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहां कानून का शासन सर्वोपरि है, वहां बिना कारण बताए, बिना कोई लिखित आदेश दिए और बिना जवाबदेही तय किए औद्योगिक माल की आवाजाही को इतने लंबे समय तक रोकना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसी मनमानी प्रशासनिक कार्रवाई देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिकों के अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े करती है तथा आपातकाल के काले दिनों की याद दिलाती है। सरकार को समझना होगा कि उद्योग केवल उद्योगपतियों का व्यवसाय नहीं हैं। उनसे लाखों लोगों का रोजगार, देश का उत्पादन, निर्यात और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई है। प्रशासनिक प्रतिबंधों के कारण यदि उद्योग बंद होते हैं, तो इसका खामियाजा मजदूरों, उनके परिवारों और अंततः पूरे देश को भुगतना पड़ेगा। इस गंभीर संकट पर राज्य एवं केंद्र सरकार की चुप्पी और निष्क्रियता अब स्वीकार्य नहीं हो सकती। यदि तत्काल हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो यह संकट देश के औद्योगिक विकास और रोजगार के लिए एक बड़ी त्रासदी का रूप ले सकता है।