सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : मां दुर्गा के आगमन में महज कुछ ही दिन शेष हैं। राज्य भर की पूजा कमेटियां अपने पूजा पंडालों को तैयार करने में जुट गये हैं। राज्य के कोने-कोने से कारीगर बड़े से लेकर छोटे तक पूजा पंडालों को तैयार करने गांवों से बड़े शहरों की ओर रूख कर रहे हैं। इसी के साथ कुम्हाटोली में मूर्तिकार और शिल्पकार एड़ी-चोटी का जोर लगाकर अपना कार्य पूरा करने में लगे हुए हैं। कहते हैं जब से बंगाल है तब से दुर्गापूजा का इतिहास रहा है। दुर्गापूजा केवल एक त्योहार नहीं बल्कि राज्य के कई ऐसे लोगों के लिए जीने का जरिया है जो अपनी कलाओं के अलावा कोई और कार्य करने में समर्थ नहीं है। आज उन्हीं लोगों के पेट पर गहरा आघात कोई और नहीं बल्कि आधुनिकता और एलिट क्लास
इमारतें कर रही हैं। मां दुर्गा के श्रृंगार के लिए पिछले 150 सालों से शोलार साज किया जाता आ रहा है। लेकिन बड़ी-बड़ी इमारतों के कारण आज मां दुर्गा का श्रृंगाल अधूरा रह जा रहा है। आप सोच रहे होंगे की यह आखिर कैसे संभव है। 'शोलार साज' असल में क्या है, कई लोग इसके बारे में भी पूरी जानकारी नहीं रखते। शोला एक थर्माकॉल की तरह एक पदार्थ है जो नैचुरल तरीके से जमे हुए पानी या तालाब में उगता है। सूखने के बाद वह नर्म लकड़ी की तरह होता है जो अंदर से थर्माकॉल की तरह है। इसके कई चिकित्सकीय फायदें भी हैं।
पर अब यह बड़ी इमारतों के कारण विलुप्त हो रहे हैं। क्योंकि इमारतों के कंस्ट्रक्शन के लिए तालाबों को भर दिया जा रहा है जो पर्यावरण के लिए खतरनाक भी है और लोगों के लिए एक चेतावनी भी है। जिस मां दुर्गा की मूर्ति इसी शोलार साज से सजाई जाती थी, अब यह केवल बोनेदी राज बाड़ियों के पैतृक पूजा आयोजनों में ही देखने को मिलते हैं। ऐसा नहीं है कि इसे खरीदने के लिए ग्राहक नहीं है, इसे खरीदने के लिए कुम्हारटोली में लोगों की होड़ लगी रहती है लेकिन शोला का निर्यात काफी कम होने के कारण शिल्पकार इन दिनों लाचार हैं। कुछ शिल्पकार ऐसे हैं जो आर्टिफिशियल थर्माकॉल का इस्तेमाल करते हैं लेकिन सरकार की ओर से इसपर प्रतिबंध लगा दिया गया है। ऐसे में इनपर आर्थिक संकट आना स्वाभाविक हो गया है।
देश-विदेश से आते हैं ऑर्डर लेकिन पूरा नहीं कर पाते
कुम्हारटोली के सबसे प्रसिद्ध शोला शिल्पकार शंभूनाथ मालाकार बताते हैं कि शोलार साज की चर्चा देश-विदेश में हैं। आज इस साज-सजावट के सामानों के लिए काफी ऑर्डर आते हैं लेकिन शिल्पकारों को ऐसी असुविधाओं से गुजरना पड़ता है जिसका समाधान होना अनिवार्य है। उनका कहना है कि आज बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हो गई हैं। ये शोला केवल जमे हुए पानी या तालाबों में उगते हैं। पहले यह कोलकाता में भी पाये जाते थे लेकिन इसे बाहर से मंगाना पड़ता है जिससे इसके दाम में काफी ज्यादा हो जाता है। सप्लाई कम हो जाती है। जयदेव कर्मकार नामक शिल्पकार बताते हैं कि पहले शोलार साज को काफई पसंद किया जाता था। मैं
'पैतृक कला को बरकरार रखना हमारा परम कर्तव्य'
शंभूनाथ मालाकार के पुत्र सुजीत मालाकार अपने पिता के साथ पिछले 20 सालों से शोलार साज का काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह हमारी पैतृक कला है जिसे हमें बरकरार रखना है। यह गुण उन्हें उनके दादा और पिता से मिली है। लेकिन जिस तरह की परिस्थिति, इसे अगली पीढ़ी बचा पाएगी या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है। सुजीत कहते हैं कि मैं दूसरे क्षेत्र में काम करना चाहता था लेकिन मेरे पिता के साथ उनका हाथ बंटाने वाला कोई नहीं था। ये हमारी विरासत है, सरकार की ओर से भी हमारे परिवार के इस कला को पहचान मिली ही, इसीलिए मेरी कोशिश है कि हम इसे बचाएं।
शोला का इस्तेमाल करते थे मेडिकल एक्सपर्ट व पुलिस अधिकारी
क्या आप जानते हैं कि शोला का इस्तेमाल दवाइंयों के लिए इस्तेमाल किया जाता था। कई दवाइयों के ढक्कन भी इसी शोला से मना जाते थे। इसके अलावा कई कारीगर इसका इस्तेमाल अपनी चोट भी ठीक करने के लिए करते थे। इसे जलाकर घाव पर लगाते थे जिससे रक्त रिसाव और दर्द से निजात पाते थे। इसके अलावा पुलिस अधिकारियों की टोपी व हेलमेट में भी इसका इस्तेमाल होता था लेकिन आज इसका उत्पादन को लेकर प्रश्न खड़ा हो गया है।