प्रगति, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : ढोलक की थाप, पारंपरिक फाग के बोल, आंगन में उड़ता गुलाल और रसोई से आती पकवानों की खुशबू… होली की यही पहचान है। हालांकि वक्त के साथ रंगों का त्योहार होली मनाने का ट्रेंड भी बदलता जा रहा है। आज रंगों के इस त्योहार में परंपरा और ट्रेंड एक साथ नजर आते हैं। कहीं लोकगीतों की मिठास, तो कहीं डीजे की तेज धुनों पर थिरकती भीड़ नजर आती है। हालांकि ब्रज की गलियों में आज भी लट्ठमार और फूलों की होली आस्था और परंपरा का प्रतीक है, लेकिन महानगरों में तस्वीर अलग है। यहां क्लब, रेन डांस, कलर-बैश और थीम पार्टियां अब होली का नया चेहरा बन चुके हैं। युवाओं के लिए यह सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि “इवेंट” है, जहां रंगों और गुलाल के साथ ड्रेस कोड, डीजे लाइनअप और इंस्टाग्राम रील्स भी उतने ही अहम हो गए हैं।
केमिकल रंगों से ऑर्गेनिक होली तक का सफर
एक समय था जब केमिकल रंगों की परवाह कम थी, लेकिन अब जागरूकता ने ऑर्गेनिक और हर्बल गुलाल की मांग बढ़ा दी है। हालांकि यह अच्छा है, क्योंकि ऑर्गेनिक और हर्बल रंगों से त्वचा को नुकसान नहीं पहुंचता है और किसी तरह की एलर्जी नहीं होती है। ‘ड्राई होली’ और ‘इको-फ्रेंडली होली’ जैसे ट्रेंड इस बात का संकेत हैं। पहले जहां रंगों से सराबोर चेहरे पूरे साल के लिए यादों में संजोए जाते थे, वहीं अब यह रील्स और स्टोरीज में भी सहेजे जाते हैं। कई युवा पारंपरिक सफेद कुर्ते की जगह थीम-आधारित ड्रेस कोड पहनते हैं, ताकि तस्वीरें ज्यादा आकर्षक लगें। यही उदाहरण है, कि आज की पीढ़ी का त्योहार मनाने का एक अलग अंदाज है।
स्वरूप बदला है, मगर सार नहीं
आज के आधुनिक दौर में होली मनाने का ट्रेंड भले ही बदल गया है, लेकिन उसका सार नहीं बदला है। आज भी होली का मतलब है, सभी भेद भाव को भूलकर प्रेम, मेल-जोल, उमंग और हर्षोल्लास के साथ होली मनाना।
12 साल के युवा की अनोखी पहल
दर्श सोनी नाम के 12 वर्षीय बच्चे ने एक प्रेरणादायक पहल की शुरुआत की है। वह फूलों के रंग, हल्दी, कॉर्न फ्लोर और भी चीजों का इस्तेमाल करके रंग बिरंगी गुलाल बनाते हैं। इस बारे में उनके पिता नवीन सोनी ने बताया कि महज एक यूट्यूब की वीडियो देखकर उनके बेटे को गुलाल बनाने का आइडिया आया था। इसके बाद दर्श सोनी ने वीडियो के मुताबिक गुलाल बनाने की कोशिश की और उनकी यह कोशिश रंग लाई। उन्होंने 2 वर्ष पहले यह पहल की थी और उस समय वह महज 10 वर्ष के थे। नवीन सोनी ने बताया कि गुलाल बनाने के लिए वह मुख्य रूप से कॉर्नफ्लोर का इस्तेमाल करते हैं। 150 ग्राम गुलाल के पैकेट का मूल्य 100 रुपये है। वह मुख्य रूप से ब्लू, पिंक, ग्रीन और येलो रंग के गुलाल बनाते हैं। उन्होंने इस गुलाल की ब्रांडिंग के.बी.सी. (कन्हैया गुलाल कंपनी) के नाम से की है। इस साल उन्होंने लगभग 5,000 गुलाल के पेकेट तैयार की है।
क्या कहा दुकानदारों ने?
राम मंदिर में गुलाल के दुकानदारों ने कहा कि ऑर्गेनिक और हर्बल गुलाल ही डिमांड में हैं। 150 ग्राम का गुलाल का पैकेट लगभग 100 रुपये और 200 ग्राम का पैकेट लगभग 150 से 160 रुपये तक बिकता है। क्वालिटी के मुताबिक दाम है। लोग वाइब्रेंट रंग खरीदना बहुत पसंद कर रहे हैं। ज्यादातर युवा दुकान में गुलाल खरीदने से पहले ये जरूर पूछते हैं कि, भैइया क्या यह रंग ऑर्गेनिक और हर्बल है।