सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : राजस्थानी प्रचारिणी सभा के बैनर तले प्रवासी राजस्थानियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने रविवार को राजस्थान के शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर से भेंट कर राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने तथा राजस्थानी का राजभाषा का दर्जा देने की मांग दोहराई। सभा के उपाध्यक्ष प्रहलाद राय गोयनका ने स्थानीय बोलियों को शिक्षा का माध्यम बनाने की दिशा में राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदम का स्वागत करते हुए कहा कि यह पहल राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण सिद्ध होगी। उन्होंने कहा कि जब सरकार बोलियों पर ध्यान दे रही है, तो राजस्थानी भाषा को भी समुचित स्थान मिलना चाहिए।राजस्थानी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष रतनशाह ने बतायाकि प्रचारिणी सभा पिछले 45 साल से राजस्थान सरकार से राजस्थानी को मान्यता दिलाने की मांग कर रही है। उन्होंने राजस्थानी भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए सभा की ओर से किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। मंत्री मदन दिलावर ने प्रतिनिधिमंडल की मांग पर सहमति जताते हुए राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के लिए प्रयास करने का आश्वासन दिया। इस अवसर पर मंत्री दिलावर ने “हर घर गाय योजना” की जानकारी देते हुए बताया कि प्रत्येक पंचायत में 150 बीघा भूमि गोचर के लिए आरक्षित की जाएगी। इसमें 50 बीघा भूमि में वृक्षारोपण, 50 बीघा में चारा उत्पादन तथा शेष 50 बीघा भूमि तालाब एवं गोचर हेतु सुरक्षित रखी जाएगी।
उन्होंने बताया कि इस योजना के क्रियान्वयन के लिए एक समिति का गठन किया गया है, जिसमें प्रहलाद राय गोयनका को भी सदस्य बनाया गया है। योजना पर अपने विचार व्यक्त करते हुए गोयनका ने कहा कि गायों के उत्पादों का समुचित उपयोग ही गौ-संरक्षण का स्थायी समाधान है। इसके लिए किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करना होगा तथा गोबर से बनने वाली गैस के वाणिज्यिक उपयोग को बढ़ावा देना आवश्यक है। इस अवसर पर राजेंद्र केडिया, रतन शाह, संदीप गर्ग, संदीप बजाज, निर्मल सराफ, नवीन टिकमानी, बुलाकीदास मिमानी, गोविंदराम अग्रवाल, विष्णुदास मित्तल, आत्माराम सोंथालिया, वेद प्रकाश अग्रवाल, अशोक पुरोहित, निर्मला गोयनका, प्रीतिश बजाज सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने मंत्री मदन दिलावर को राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल के नाम एक ज्ञापन सौंपा जिसमे राजस्थानी भाषा को अनुच्छेद-345 के तहत प्रदेश की राजभाषा घोषित करने की मांग की गई। ज्ञापन में कहा गया कि राजस्थानी भाषा, राजस्थान के सभी प्रदेशवासियों की मातृभाषा है, इसका संवर्धन, संरक्षण एव विकास करना हमारा दायित्व है। राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता का आन्दोलन आजादी के पूर्व से अहिंसात्मक रूप से चला आ रहा है । ज्ञापन में बताया गया है कि यूजीसी, आरपीएससी, एनसीईआरटी, अमेरिका नेपाल, सीताकांत-महापात्र कमेटी एवं केन्द्रीय साहित्य अकादमी में आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं के साथ अंग्रेजी के अलावा एकमात्र राजस्थानी भाषा को सन् 1974 से मान्यता प्राप्त है।पद्मश्री सीताराम लालस द्वारा रचित राजस्थानी भाषा का शब्दकोश विश्व में सबसे बड़ा शब्दकोश है, जिसमें लगभग ढाई लाख से अधिक शब्द है, जो हम सभी राजस्थानवासियों के लिए अत्यंत गौरव एवं गर्व की बात है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी, भाषा वैज्ञानिकों एवं नई शिक्षा नीति में मातृभाषा में शिक्षा देने हेतु विशेष जोर दिया गया है, कुछ समय पूर्व झारखंड में लगभग 16 भाषाओं, छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी को, वर्ष 2020 में कश्मीर में डोगरी एवं हाल ही जून, 2025 में भोटी व पूर्वी को लद्दाख की राजभाषा का दर्जा दिया गया है, जबकि राजस्थानी भाषा को आजादी के पूर्व में अंग्रेजों ने भी पत्र-व्यवहार आदि के लिए मान्यता दे रखी थी, किन्तु इसके बाद राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं मिलना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है, जबकि भारत के अन्य सभी राज्यों में अपनी-अपनी मातृभाषाओं को बोलने एवं लिखने में अत्यंत गर्व महसूस करते हैं। ज्ञापन में मुख्यमंत्री से निवेदन किया गया है कि राजस्थान राजभाषा एक्ट, 1956 में संशोधन करके, अनुच्छेद- 345 के तहत राजस्थानी भाषा को हिन्दी के साथ प्रदेश की राजभाषा घोषित करें, ताकि राजस्थान की गौरवशाली संस्कृति एवं भाषा का संरक्षण, संवर्धन एवं विकास हो। अतः आप राजस्थान के सभी संतों, साध्वियों, देवी-देवताओं, सूरमाओं आदि की मातृभाषा राजस्थानी को राजभाषा बनाने हेतु दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति दिखाते ऐतिहासिक निर्णय लेकर हिन्दी के साथ राजस्थानी को राजभाषा घोषित करें।