सन्मार्ग संवाददाता
बहरमपुर: चुनावी माहौल के बीच मुर्शिदाबाद के सूटी इलाके में 12 वर्षीय रुक्साना खातून स्कूल जाने से पहले अपनी मां के साथ बीड़ी बनाने में मदद करती है। यह दृश्य इस क्षेत्र के बीड़ी बेल्ट की उस सच्चाई को उजागर करता है, जहां हजारों बच्चे अनौपचारिक रूप से अपने परिवार की आय में योगदान देने के लिए काम करते हैं।
सूटी, समसेरगंज, धूलियान और लालगोला जैसे इलाकों में फैला बीड़ी उद्योग स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जिससे करीब 25 लाख लोग जुड़े हैं। यहां अधिकतर घर ही कार्यस्थल बन जाते हैं, जहां महिलाएं और बच्चे तंबाकू रोल करते हैं। प्रति 1000 बीड़ी पर परिवार को केवल 160 से 190 रुपये मिलते हैं, जिससे आजीविका कठिन हो जाती है।
मजदूरों का आरोप है कि ठेकेदार या मुंशी ही काम, भुगतान और सरकारी सुविधाओं को नियंत्रित करते हैं। कई महिलाओं का कहना है कि चुनावों के दौरान उन्हें यह भी बताया जाता है कि किस राजनीतिक दल का समर्थन करना है, वरना काम बंद होने का खतरा रहता है। कम मजदूरी और असुरक्षित कार्य वातावरण के कारण महिलाएं और बच्चे लंबे समय तक तंबाकू के संपर्क में रहते हैं, जिससे खांसी, अस्थमा और अन्य श्वसन रोग आम हो गए हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में भी सांस संबंधी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। हालांकि मजदूरों के विरोध के बाद मजदूरी में मामूली बढ़ोतरी हुई है, लेकिन परिस्थितियों में बड़ा बदलाव नहीं आया है। राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं, जबकि बीड़ी बेल्ट में असली समस्या आज भी गरीबी, शोषण, स्वास्थ्य संकट और बच्चों का छिनता बचपन बनी हुई है।