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पश्चिम बंगाल

18 साल बाद भी सिंगूर में जमीन और राजनीति का संघर्ष जारी

विकास रुका, राजनीति बदली

Paresnjitt

सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता: हुगली जिले के अंतर्गत सिंगूर आज भी उस अधूरी औद्योगिक कहानी का गवाह है, जिसने राज्य की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। टाटा मोटर्स की नैनो परियोजना के 2008 में यहां से हटने के 18 साल बाद भी यह इलाका विकास और अभाव के बीच झूल रहा है।

वर्ष 2006 में लगभग 1,000 एकड़ भूमि पर प्रस्तावित इस परियोजना के खिलाफ आंदोलन तेज हुआ, जिसकी अगुवाई ममता बनर्जी ने की। इस आंदोलन ने न केवल परियोजना को रोक दिया, बल्कि 2011 में वाम मोर्चे की सत्ता भी समाप्त कर दी। हालांकि, आज स्थिति मिश्रित है।

खेतों में अब भी कंक्रीट और लोहे के अवशेष दिखाई देते हैं, और कई किसानों का कहना है कि जमीन पहले जैसी उपजाऊ नहीं रही। किसान आशीष बेरा जैसे लोग बताते हैं कि खेती की लागत बढ़ गई है, लेकिन उत्पादन घट गया है।

पूर्व आंदोलनकारी भी अब विभाजित राय रखते हैं। कुछ मानते हैं कि जमीन बचाना सही था, जबकि कई युवा कहते हैं कि अगर फैक्टरी बनी रहती तो रोजगार के अवसर मिलते। सुप्रीम कोर्ट के 2016 के फैसले के बाद जमीन लौटाने की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन जमीनी हकीकत में बदलाव सीमित रहा।

राजनीतिक रूप से सिंगूर आज भी तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ है। पार्टी का दावा है कि सड़कें, योजनाएं और मुआवजे ने लोगों को राहत दी है, जबकि विपक्ष इसे अवसर गंवाने की कहानी बताता है। आज सिंगूर केवल एक औद्योगिक परियोजना का प्रतीक नहीं, बल्कि यह सवाल भी है कि विकास और कृषि के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

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