बंगाल की ओर से प्रधानमंत्री मोदी को दिए गए उपहार आकर्षक हैं।  
पश्चिम बंगाल

बंगाल से मोदी को मिले 109 उपहारों में सिमटा रंग-बिरंगा सांस्कृतिक संसार

Rajesh Nain

सर्जना शर्मा पश्चिम बंगाल को समझना हो तो केवल उसके इतिहास के पन्ने पलटना पर्याप्त नहीं। उसकी असली पहचान उसके मंदिरों की घंटियों, दुर्गा पूजा की भव्यता, शोलापीठ की महीन नक्काशी, बांकुड़ा के घोड़ों, विष्णुपुर की टेराकोटा कला और उन विभूतियों की स्मृतियों में दिखाई देती है जिन्होंने भारतीय साहित्य, कला और आध्यात्मिक चेतना को नई दिशा दी। प्रधानमंत्री स्मृति चिह्नों की आठवीं ई-नीलामी में शामिल पश्चिम बंगाल के 109 स्मृति चिह्न इसी विविध सांस्कृतिक संसार की एक झलक प्रस्तुत करते हैं। इन स्मृति चिह्नों में कहीं भक्ति है, कहीं लोककला की सहजता, कहीं शिल्पकार के हाथों की बारीकी तो कहीं बंगाल के गौरवशाली साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास की स्मृति।

बंगाल की पहचान से जुड़ी शोलापीठ कला इन स्मृति चिह्नों में खास आकर्षण पैदा करती है। भारतीय कॉर्क से तैयार शोलापीठ से मां दुर्गा का मुख बनाया गया है। सफेद रंग की इस हल्की और नाजुक सामग्री पर की गई महीन कारीगरी देवी के स्वरूप को विशिष्ट सौंदर्य प्रदान करती है। इसी परंपरा का एक और उदाहरण मां लक्ष्मी की शोलापीठ कलाकृति है। देवी का मुख, बहुस्तरीय मुकुट, एक हाथ में कलश और आसपास बैठे उल्लु शिल्पकार के काम की बारीकी और धैर्य को दर्शाते हैं। बंगाल की धार्मिक आस्था और लोक शिल्प यहां एक-दूसरे में घुलते दिखाई देते हैं।

बंगाल के उपहारों में काली मां की प्रतिमा भी शामिल।

पश्चिम बंगाल की लोककला का जिक्र बांकुड़ा के घोड़ों के बिना अधूरा है। संग्रह में शामिल हस्तनिर्मित लकड़ी के बांकुड़ा घोड़े अपनी लंबी गर्दन, खड़े कान और ज्यामितीय आकृतियों के कारण तुरंत ध्यान खींचते हैं। पंचमुरा की कलात्मक परंपरा से जुड़े ये घोड़े बंगाल की ग्रामीण कला की विशिष्ट पहचान बन चुके हैं। बंगाल की सांस्कृतिक यात्रा विष्णुपुर पहुंचे बिना पूरी नहीं होती। संग्रह में विष्णुपुर के ऐतिहासिक रासमंच का हाथ से बनाया गया चित्र इस स्थापत्य विरासत को स्मृति चिह्न के रूप में सामने लाता है। पिरामिड जैसी संरचना और मेहराबदार गलियारों वाला रासमंच बंगाल की विशिष्ट टेराकोटा स्थापत्य परंपरा का प्रतिनिधि है। कलाकार निबेदिता नेमा द्वारा हस्ताक्षरित यह चित्र इतिहास और कला के मेल का उदाहरण है। पश्चिम बंगाल का सांस्कृतिक संसार केवल लोकशिल्प और मंदिरों तक सीमित नहीं है।

संग्रह में बाबा लोकेनाथ की दो प्रतिमाएं भी हैं। आध्यात्मिक साधना, योग और भक्ति से जुड़े बाबा लोकेनाथ बंगाल की धार्मिक चेतना में विशेष स्थान रखते हैं। इनमें एक प्रतिमा सिरेमिक से निर्मित है। इसके साथ ही स्मृति चिह्नों में रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद और सत्यजीत रे जैसी विभूतियों की स्मृतियां भी शामिल हैं। साहित्य से लेकर शिक्षा, आध्यात्मिकता और सिनेमा तक—इन व्यक्तित्वों ने बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को व्यापक भारतीय परिप्रेक्ष्य दिए।

संग्रह में मदन मोहन मंदिर, जलपेश मंदिर, तारापीठ, दक्षिणेश्वर और कालना के ऐतिहासिक मंदिरों से जुड़े स्मृति चिह्न भी हैं। इनके माध्यम से बंगाल की धार्मिक परंपरा के अलग-अलग स्वरूप सामने आते हैं। कहीं मंदिर स्थापत्य दिखाई देता है, तो कहीं देवी-देवताओं के प्रति गहरी लोक आस्था।दुर्गा पूजा से जुड़े शिल्प इस सांस्कृतिक तस्वीर को और व्यापक बनाते हैं। बंगाल में दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि कला, शिल्प, सामुदायिक सहभागिता और रचनात्मकता का भी बड़ा उत्सव है।

प्रधानमंत्री स्मृति चिह्नों की ई-नीलामी में पश्चिम बंगाल के ये 109 स्मृति चिह्न किसी एक कला या परंपरा का प्रतिनिधित्व नहीं करते। वे मिलकर बंगाल की एक ऐसी सांस्कृतिक तस्वीर बनाते हैं जिसमें मंदिर और लोककला साथ-साथ हैं, देवी की प्रतिमा के साथ साहित्यकारों की स्मृतियां हैं, बांकुड़ा के घोड़े के साथ विष्णुपुर की टेराकोटा विरासत है और शोलापीठ की नाजुक कला के साथ ग्रामीण हस्तशिल्प की सहजता। यही इस संग्रह की विशेषता है—यह पश्चिम बंगाल को किसी एक पहचान में बांधने के बजाय उसके अनेक रंगों . विविधताओं और विधाओं को एक साथ सामने लाता है।

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