उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की महत्वाकांक्षी योजना "एक जिला एक व्यंजन" केवल एक प्रशासनिक पहल नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक, आर्थिक और खाद्य विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने वाला एक दूरदर्शी अभियान है। यदि इस योजना को सही रणनीति, गुणवत्तापूर्ण ब्रांडिंग, आधुनिक पैकेजिंग और राष्ट्रीय-वैश्विक विपणन के साथ लागू किया जाए, तो यह निश्चित रूप से "ब्रांड इंडिया" की नई पहचान बन सकती है। मुझे पूरा विश्वास है कि भविष्य में यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सबसे स्वर्णिम निर्णयों में गिना जाएगा।
ओडीओपी के माध्यम से प्रदेश के पारंपरिक उद्योगों, हस्तशिल्प, हथकरघा और स्थानीय उत्पादों को नया जीवन मिला। लाखों कारीगरों को रोजगार मिला, निर्यात में वृद्धि हुई और उत्तर प्रदेश के उत्पाद वैश्विक बाजार तक पहुंचे।
"एक जिला एक उत्पाद"
इससे पहले भी उत्तर प्रदेश की "एक जिला एक उत्पाद" योजना ने देश-विदेश में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। ओडीओपी के माध्यम से प्रदेश के पारंपरिक उद्योगों, हस्तशिल्प, हथकरघा और स्थानीय उत्पादों को नया जीवन मिला। लाखों कारीगरों को रोजगार मिला, निर्यात में वृद्धि हुई और उत्तर प्रदेश के उत्पाद वैश्विक बाजार तक पहुंचे। इसी प्रकार विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना ने पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को आधुनिक प्रशिक्षण एवं वित्तीय सहायता देकर आत्मनिर्भर बनाया। इन दोनों योजनाओं की सफलता को देखते हुए भारत सरकार ने भी इनके स्वरूप को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया। अब पूरी संभावना है कि "एक जिला एक व्यंजन" भी भविष्य में भारत सरकार की प्रमुख योजनाओं में शामिल होगा क्योंकि इसकी संभावनाएं अत्यंत व्यापक हैं।
"राम कटोरी"
इस विचार से मेरा व्यक्तिगत जुड़ाव भी रहा है। नवंबर 2024 में मैं अपने गृह जनपद महाराजगंज के निचलौल क्षेत्र गया था। वहां मिठौरा बाजार में मुझे पहली बार "राम कटोरी" मिठाई खाने का अवसर मिला। यह मैदा से बनी कटोरी में शुद्ध खोया भरकर तैयार की जाने वाली अत्यंत स्वादिष्ट और अनोखी मिठाई है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता केवल इसका स्वाद नहीं बल्कि इसका इतिहास भी है। स्थानीय लोगों के अनुसार इसकी उत्पत्ति का संबंध राम मंदिर आंदोलन के समय से जुड़ा हुआ है जिसने इसे सांस्कृतिक महत्व भी प्रदान किया है।
राम कटोरी केवल महाराजगंज की पहचान नहीं है बल्कि सिद्धार्थनगर जनपद के कई स्थानों पर भी बड़े पैमाने पर बनाई जाती है। तभी मेरे मन में विचार आया कि जब यह मिठाई दो जिलों की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है तो इसे "एक जिला एक उत्पाद" योजना के अंतर्गत क्यों न शामिल किया जाए। गांव से लौटते ही मैंने नवंबर 2024 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि राम कटोरी को महाराजगंज एवं सिद्धार्थनगर दोनों जिलों के ODOP उत्पाद के रूप में सूचीबद्ध किया जाए।
वोकल फॉर लोकल के मेरे इस सुझाव के पीछे केवल एक मिठाई को पहचान दिलाने का उद्देश्य नहीं था। मेरा विश्वास था कि यदि सरकार की नीतिगत सहायता मिले तो यह मिठाई निर्यातोन्मुख उत्पाद बन सकती है। इससे स्थानीय उद्यमियों को नए अवसर मिलेंगे, युवाओं को रोजगार मिलेगा, दुग्ध उत्पादन और गौपालन को बढ़ावा मिलेगा तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। शुद्ध खोया की बढ़ती मांग के कारण स्थानीय स्तर पर दूध उत्पादन भी बढ़ेगा जिससे किसानों की आय में वृद्धि होगी। इस प्रकार एक छोटी-सी मिठाई पूरे ग्रामीण आर्थिक तंत्र को गति देने की क्षमता रखती है।
जिस प्रकार मथुरा का पेड़ा, आगरा का पेठा और बंगाल का रसगुल्ला विश्व प्रसिद्ध हो चुके हैं, उसी प्रकार राम कटोरी में भी वैश्विक पहचान बनाने की पूरी क्षमता मौजूद है।
आज भी महाराजगंज के मिठौरा तथा सिद्धार्थनगर और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में राम कटोरी बनाई जाती है। इसके साथ-साथ शुद्ध खोया के पेड़ों का उत्पादन भी व्यापक स्तर पर होता है। यह मिठाई स्थानीय लोगों के अलावा देश के विभिन्न महानगरों तथा विदेशों में बसे प्रवासी भारतीयों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। खाड़ी देशों में रहने वाले लोग इसे विशेष रूप से उपहार के रूप में मंगवाते हैं। जिस प्रकार मथुरा का पेड़ा, आगरा का पेठा और बंगाल का रसगुल्ला विश्व प्रसिद्ध हो चुके हैं, उसी प्रकार राम कटोरी में भी वैश्विक पहचान बनाने की पूरी क्षमता मौजूद है।
कुछ महीनों बाद जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने "एक जिला एक व्यंजन" योजना की घोषणा की तो मुझे ऐसा लगा मानो वर्षों से मन में पल रहा विचार पंख लगाकर उड़ने लगा हो। यह योजना वास्तव में ODOP का स्वाभाविक विस्तार है। जहां ODOP मुख्यतः उत्पाद आधारित औद्योगिक विकास पर केंद्रित है, वहीं ODOD सीधे स्थानीय खान-पान, संस्कृति और पर्यटन को जोड़ता है।
इससे रोजगार का विकेंद्रीकरण होगा और गांव-गांव तक आय के नए स्रोत विकसित होंगे।
इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें निवेश अपेक्षाकृत बहुत कम होगा। किसी बड़े कारखाने या मशीनरी की आवश्यकता नहीं होगी। स्थानीय परिवार, महिला स्वयं सहायता समूह, छोटे उद्यमी, हलवाई, डेयरी संचालक तथा युवा उद्यमी भी सीमित पूंजी में व्यवसाय शुरू कर सकते हैं। इससे रोजगार का विकेंद्रीकरण होगा और गांव-गांव तक आय के नए स्रोत विकसित होंगे। यही किसी भी समावेशी आर्थिक विकास की सबसे बड़ी पहचान है।
बनारस की चाट, आगरा का पेठा, मथुरा का पेड़ा, जौनपुर की इमरती, अमृतसर का कुलचा, जयपुर का घेवर, दक्षिण भारत का डोसा और इडली केवल व्यंजन नहीं बल्कि उन क्षेत्रों की सांस्कृतिक पहचान हैं।
भारत में किसी भी शहर या जिले की पहचान केवल उसके इतिहास या स्मारकों से नहीं होती बल्कि वहां के स्वाद से भी होती है। बनारस की चाट, आगरा का पेठा, मथुरा का पेड़ा, जौनपुर की इमरती, अमृतसर का कुलचा, जयपुर का घेवर, दक्षिण भारत का डोसा और इडली केवल व्यंजन नहीं बल्कि उन क्षेत्रों की सांस्कृतिक पहचान हैं। यदि प्रत्येक जिले के विशिष्ट व्यंजन को संस्थागत पहचान, गुणवत्ता प्रमाणन और ब्रांडिंग मिले तो भारत का खाद्य मानचित्र विश्व के सामने एक नई शक्ति के रूप में उभरेगा।
यदि सरकार, निजी क्षेत्र और डिजिटल प्लेटफॉर्म मिलकर कार्य करें तो देश के किसी भी जिले का प्रसिद्ध व्यंजन कुछ ही घंटों में दूसरे राज्य तक पहुंच सकता है।
आज ई-कॉमर्स और फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म पूरे देश को जोड़ रहे हैं। यदि सरकार, निजी क्षेत्र और डिजिटल प्लेटफॉर्म मिलकर कार्य करें तो देश के किसी भी जिले का प्रसिद्ध व्यंजन कुछ ही घंटों में दूसरे राज्य तक पहुंच सकता है। भविष्य में आधुनिक कोल्ड-चेन, वैक्यूम पैकेजिंग, GI टैग, FSSAI गुणवत्ता मानक और डिजिटल मार्केटिंग के माध्यम से स्थानीय व्यंजन राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं। फ़ूड के एक या दो आइटम मक्डोनाल्ड और केएफसी वैश्विक विस्तार पा सकते हैं तो भारत में तो हजारों फ़ूड वेरायटी है, जरूरत है एक दिशा देने की।
स्वाद लोगों को जोड़ने का सबसे सहज माध्यम है।
इस योजना का एक और महत्वपूर्ण पक्ष राष्ट्रीय एकीकरण है। जब उत्तर प्रदेश का कोई व्यक्ति चेन्नई जाकर वहां का पारंपरिक भोजन पसंद करता है, या केरल का कोई परिवार बनारस की चाट, जौनपुर की इमरती अथवा आगरा का पेठा अपने घर पर मंगवाता है, तब केवल भोजन का आदान-प्रदान नहीं होता बल्कि संस्कृतियों का भी मिलन होता है। स्वाद लोगों को जोड़ने का सबसे सहज माध्यम है। "एक जिला एक व्यंजन" भारत की इसी सांस्कृतिक विविधता को राष्ट्रीय एकता की नई शक्ति में बदल सकता है।
भविष्य में "फूड टूरिज्म" भारत के पर्यटन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
इस योजना का पर्यटन उद्योग पर भी अत्यंत सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। भविष्य में "फूड टूरिज्म" भारत के पर्यटन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। लोग केवल ऐतिहासिक स्थलों को देखने नहीं, बल्कि स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेने के लिए भी जिलों की यात्रा करेंगे। इससे होटल उद्योग, परिवहन, स्थानीय बाजार, हस्तशिल्प और अन्य सेवाओं को भी प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि उत्तर प्रदेश की इस अभिनव पहल को केंद्र सरकार राष्ट्रीय मिशन के रूप में अपनाए। प्रत्येक जिले के पारंपरिक व्यंजन का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण हो, गुणवत्ता मानक तय किए जाएं, GI टैग और ब्रांडिंग को बढ़ावा मिले, उद्यमियों को प्रशिक्षण एवं वित्तीय सहायता दी जाए तथा निर्यात के लिए विशेष नीति बनाई जाए। यदि यह प्रयास योजनाबद्ध ढंग से किया गया तो आने वाले वर्षों में "एक जिला एक व्यंजन" केवल उत्तर प्रदेश की नहीं, बल्कि पूरे भारत की पहचान बन सकता है।
भारत की विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति है
भारत की विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। यदि हर जिले का स्वाद दुनिया तक पहुंचे, तो भारतीय संस्कृति, कृषि, दुग्ध उत्पादन, पर्यटन, रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था सभी को नई गति मिलेगी। जिस प्रकार "मेक इन इंडिया" ने भारत की विनिर्माण क्षमता को नई पहचान दी, उसी प्रकार "एक जिला एक व्यंजन" भारत की खाद्य विरासत को वैश्विक मंच पर स्थापित कर सकता है। यह केवल स्वाद का अभियान नहीं होगा बल्कि आत्मनिर्भर भारत, ग्रामीण समृद्धि, सांस्कृतिक संरक्षण और "ब्रांड इंडिया" के निर्माण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम सिद्ध होगा। पंकज जायसवाल( युवराज फीचर्स )