यूसीसी पर रणनीति के अनुसार चल रही है भाजपा 
उत्तर प्रदेश

आठ भाजपा शासित राज्यों में यूसीसी की रफ्तार, पर उत्तर प्रदेश में ठहराव क्यों? रणनीतिक इंतज़ार या कुछ और ?

नयी दिल्ली : भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक और चुनावी एजेंडे में देश भर में समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू करना हमेशा से शीर्ष प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। पिछले करीब सवा दशक में पार्टी ने इस दिशा में बड़े रणनीतिक फैसले लिए हैं। इस मुहिम का आगाज़ उत्तराखंड से हुआ, जिसने स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार अपने यहां यूनिफॉर्म सिविल कोड पारित कर एक मिसाल कायम की। इसके बाद, अब तक लगभग आठ राज्य इस दिशा में नीतिगत कदम आगे बढ़ा चुके हैं । लेकिन, इन सबके बीच एक बड़ा सवाल राजनीतिक गलियारों में तैर रहा है कि देश की सबसे बड़ी सियासी ज़मीन और सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहां पिछले साढ़े नौ वर्षों से भाजपा का पूर्ण बहुमत वाला शासन है, इस विषय पर अब तक कोई ठोस कानूनी पहल क्यों नहीं की गई?

भाजपा के नीति-निर्धारकों और शीर्ष नेताओं की मानें तो उत्तर प्रदेश को लेकर यह सुस्ती अनायास नहीं, बल्कि एक बेहद नपी-तुली और दूरगामी रणनीति का हिस्सा है । एक सोची-समझी योजना के तहत सबसे पहले उत्तराखंड जैसे अपेक्षाकृत छोटे राज्य को इस कानून के लिए चुना गया । इसका मुख्य उद्देश्य इसके सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव, जनता की प्रतिक्रिया और इससे जुड़े पेचीदा कानूनी पहलुओं का जमीनी स्तर पर अध्ययन करना था ।

इस कदम के पीछे एक बड़ी वजह यह भी थी कि एक अंदेशा था कि समान नागरिक संहिता जैसे संवेदनशील कानून को देश की अदालतों में चुनौती दी जाएगी । लिहाजा, पार्टी का मानना था कि किसी भी बड़े सूबे में हाथ डालने से पहले न्यायपालिका के रुख को अच्छी तरह समझ लेना ज्यादा सुरक्षित होगा । वर्तमान में, उत्तराखंड के इस कानून को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा चुकी है।

इतने राज्यों में भाजपा के सीएम

इसके बाद एक-एक कर भाजपा शासित राज्यों ने आगे बढ़ना शुरू भी कर दिया है । अभी 17 राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री हैं। इनमें गुजरात, प. बंगाल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और असम ने उत्तराखंड की तर्ज पर समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए कदम उठा लिए हैं। गुजरात और असम ने इसे लागू करने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है। वहीं अन्य पांच भाजपा शासित राज्यों में समान नागरिक संहिता के लिए समितियों का गठन कर दिया गया है और जल्दी ही विधेयक भी विधानसभा में लाए जाएंगे ।

अमित शाह का आश्वासन

गृह मंत्री अमित शाह मई 2026 में आयोजित जनजातीय महाकुंभ में आदिवासी समुदायों को आश्वस्त कर चुके हैं कि जो भी यूसीसी लागू होगा, वह आदिवासी क्षेत्रों और आदिवासी व्यक्तियों पर लागू नहीं होगा। साथ ही, उनके अधिकारों, संस्कृति और परंपराओं से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी । उत्तराखंड के कानून में भी आदिवासियों को बाहर रखा गया है और यही आश्वासन अन्य राज्यों में भी दिया गया है ।

दरअसल समान नागरिक संहिता पर राज्य दर राज्य आगे बढ़ना केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की घोषणा के अनुरूप ही है। उन्होंने राज्य सभा में कहा था कि भाजपा अपने शासन वाले सभी राज्यों में समान नागरिक संहिता को लागू करेगी। वह यह भी कह चुके हैं कि उत्तराखंड के समान नागरिक संहिता कानून का कानूनी और सामाजिक स्तर पर बारीकी से अध्ययन करने के बाद वहां से मिले फीडबैक के आधार पर अन्य भाजपा शासित राज्यों में इसे लागू करने के लिए आगे बढ़ा जा रहा है।

योगी का क्या रुख है

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा ने अभी तक समान नागरिक संहिता की दिशा में कोई कदम आगे क्यों नहीं बढ़ाया है। वैसे यूसीसी पर योगी आदित्यनाथ का रुख हमेशा से स्पष्ट रहा है। मुख्यमंत्री बनने के ठीक एक महीने बाद, अप्रैल 2017 में लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान योगी आदित्यनाथ ने तीन तलाक के मुद्दे पर बोलते हुए यूसीसी की वकालत की थी। उन्होंने तीन तलाक की तुलना 'चीर हरण' से करते हुए कहा था कि कुछ लोग देश की इस ज्वलंत समस्या पर मुंह बंद किए हुए हैं। उन्होंने जोर देकर कहा था कि "समान नागरिक संहिता देश के विकास और महिलाओं को बराबरी का हक देने के लिए बेहद जरूरी है। जब देश एक है, तो कानून भी एक होना चाहिए।"

यूसीसी को सामाजिक न्याय से जोड़ा था

इसके बाद जुलाई 2023 में योगी ने यूसीसी को सामाजिक न्याय  से जोड़ा था। उन्होंने विपक्षी दलों के सामाजिक न्याय के नारे पर तंज कसते हुए कहा, "वास्तविक सामाजिक न्याय की शुरुआत परिवार से होनी चाहिए, चाहे वह किसी भी धर्म का हो। आधी आबादी को उनके अधिकारों से वंचित करके आप सामाजिक न्याय की बात नहीं कर सकते।" उन्होंने यह भी विश्वास जताया था कि "एक न एक दिन देश में समान नागरिक संहिता जरूर लागू होकर रहेगी।" जब देश भर में विधि आयोग  ने यूसीसी पर आम जनता और धार्मिक संगठनों से सुझाव मांगे थे, तब उत्तर प्रदेश राज्य विधि आयोग ने भी इस पर अपनी सैद्धांतिक सहमति दी थी।

फिर लागू क्यों नहीं हुआ ?

भाजपा नेताओं के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं । वे इस बात से इनकार करते हैं कि आपसी मतभेदों के कारण ऐसा हुआ. बल्कि इसके पीछे व्यावहारिक, सामाजिक और राजनीतिक कारण हैं । सबसे अहम बात तो यह है कि 2022 के चुनावी घोषणापत्र में वादा न होने के कारण भाजपा पर इसे पूरा करने की कोई चुनावी बाध्यता नहीं है ।

पार्टी नेताओं के अनुसार सोची समझी रणनीति के तहत समान नागरिक संहिता लागू करने की शुरुआत उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य से की गई ताकि उसके प्रभाव और प्रतिक्रिया का समुचित अध्ययन हो सके। अगर इसे उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में लागू किया जाता तो उसके परिणाम के बारे में अनुमान लगाना मुश्किल था। करीब 25 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में करीब 20 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है। साथ ही, दलित, पिछड़े और विभिन्न जनजातीय या क्षेत्रीय रीति-रिवाज मानने वाले लोग रहते हैं। बिना तैयारी के इतने बड़े कदम को लागू करने से कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है।

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