सुलतानपुर : सुलतानपुर की एक विशेष अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) कोर्ट ने दलित से अत्याचार, मारपीट और गैर इरादतन हत्या के प्रयास के एक मामले की जांच में कथित हेरफेर को लेकर दो पुलिस अधिकारियों को मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी किया है।
विशेष न्यायाधीश (SC/ST अधिनियम) राकेश पांडेय ने जांच में कथित अनियमितताओं को गंभीरता से लेते हुए अमेठी के तत्कालीन अपर पुलिस अधीक्षक हरेंद्र कुमार और क्षेत्राधिकारी अखिलेश वर्मा के खिलाफ समन जारी किया।
कोर्ट ने आदेश की एक प्रति प्रमुख सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक को भेजे जाने का भी निर्देश दिया ताकि विभागीय कार्रवाई शुरू की जा सके। सरकारी अधिवक्ता सुशील उपाध्याय ने बताया कि कोर्ट ने शुक्रवार को यह आदेश पारित करते हुए जांच प्रक्रिया को ‘निंदनीय’ करार दिया।
कोर्ट ने कहा कि पांच नामजद आरोपियों के खिलाफ अलग-अलग जांच अधिकारियों ने कई बार आरोपपत्र दाखिल किए लेकिन कुमार ने आरोपपत्र बार-बार वापस कर दिए और जांच में हस्तक्षेप किया।
कोर्ट ने कहा कि आरोपी विक्रम सिंह का नाम मामले से हटा दिया गया था। इसे सरकारी पद के दुरुपयोग एवं निष्पक्ष जांच में हस्तक्षेप के जरिये न्याय की प्रक्रिया को पटरी से उतारने और मुख्य आरोपी को बचाने का प्रयास करार दिया।
कोर्ट ने पीड़ित की याचिका स्वीकार करते हुए विक्रम सिंह को मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी किया। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक साजिश, लोक सेवक द्वारा आदेश की अवहेलना, गलत सूचना देने, सबूत नष्ट करने और अपराधियों को बचाने से संबंधित प्रावधानों के तहत अधिकारियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है। दोषी ठहराए जाने पर आरोपियों को सात साल तक की कैद हो सकती है।
यह मामला अमेठी के गौरीगंज थाने के अंतर्गत पूरे गोसाई सुजानपुर गांव निवासी वीरेंद्र कुमार द्वारा 25 मार्च, 2024 को दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा है। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि ग्राम प्रधान चुनाव से जुड़े विवाद के कारण उसके साथ मारपीट की गई। उसने नरेंद्र सिंह, विक्रम सिंह, मोनू सिंह, प्रदीप और कपिलदेव पाठक को आरोपी बनाया था।
प्रारंभिक जांच के दौरान तत्कालीन क्षेत्राधिकारी मयंक द्विवेदी ने सभी आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था लेकिन तत्कालीन अपर पुलिस अधीक्षक ने इसे वापस कर दिया था।
बाद में क्षेत्राधिकारी अखिलेश वर्मा ने जांच अपने हाथ में ली और आरोपपत्र दाखिल किया। आरोप है कि इसे चार बार वापस किया गया और इसके बाद विक्रम सिंह का नाम मामले से हटा दिया गया।