देवी दुर्गा की मूर्ति 
उत्तर प्रदेश

'मन की आंखों' से मूर्तियां गढ़ रहे राम पाल

जन्म से ही दृष्टिहीन मूर्तिकार राम पाल (50) पिछले हर साल यूपी के बबुरहवा गांव आते हैं

Santosh Sharma

बस्ती : राम पाल जब मिट्टी को अपनी उंगलियों में थामते हैं तो उनके लिए वह महज मिट्टी नहीं रह जाती। उनकी उंगलियों के स्पर्श से उसमें मानो जान आ जाती है और उनके मन में बसे देवी-देवताओं के चेहरे धीरे-धीरे आकार लेने लगते हैं।

जन्म से ही दृष्टिहीन पश्चिम बंगाल निवासी मूर्तिकार राम पाल (50) पिछले करीब 25 वर्षों से हर साल अपने परिवार के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के बबुरहवा गांव आते हैं। वह छावनी इलाके में करीब छह महीने बिताकर आगामी त्योहारों के लिए मां दुर्गा और भगवान गणेश की प्रतिमाएं गढ़ते हैं।

राम पाल अपनी उंगलियों से मूर्तियों की हर वक्रता, हर उभार और हर अनुपात को महसूस करते हुए उन्हें आकार देते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि उनके हाथों से बनी मूर्तियां इतनी जीवंत लगती हैं कि उन्हें देखकर उनमें जान होने का आभास होता है।

राम पाल ने कहा, मुझे मूर्तियां बनाने के लिए आंखों की जरूरत नहीं है। उनका रूप और आकार पहले से ही मेरे मन और आत्मा में मौजूद है। वह अपनी इस कला को ईश्वर का आशीर्वाद मानते हैं।

कुम्हार समुदाय से आने वाले राम पाल का परिवार पीढ़ियों से शिल्पकारी करता रहा है। उन्होंने बताया कि परिवार की मदद से वह हर साल करीब 40 से 50 दुर्गा और गणेश की मूर्तियां बनाते हैं।

उनका परिवार पश्चिम बंगाल के नवाडीहा स्थित निकुंज नगर से दुर्गा पूजा से करीब छह महीने पहले बबुरहवा पहुंचता है। त्योहार के समापन और मूर्तियों की स्थापना के बाद वह वापस कोलकाता लौट जाते हैं। वहां साल के बाकी छह महीने वे मिट्टी के बर्तन, खिलौने और मिट्टी से बनी दूसरी चीजें तैयार करते हैं।

आश्विन मास में मनाई जाने वाली दुर्गा पूजा में देवी दुर्गा की आराधना की जाती है। उन्हें शक्ति और नारी सामर्थ्य का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक परंपरा में देवी दुर्गा को महिषासुर का वध करते हुए चित्रित किया जाता है।

यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है और विजयादशमी के आसपास इसका समापन होता है। दुर्गा पूजा में मूर्तियों का विशेष महत्व है। आमतौर पर मिट्टी से बनाई गई इन मूर्तियों को चटख रंगों से सजाया जाता है और पूजा के दौरान इन्हीं के सामने श्रद्धालु आराधना करते हैं।

उत्सव के समापन पर मूर्तियों का विधिवत विसर्जन किया जाता है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता माना जाता है और किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले उनकी पूजा की जाती है। हालांकि बबुरहवा और आसपास के इलाकों के श्रद्धालुओं के लिए राम पाल की बनाई मूर्तियों का महत्व इससे कहीं अधिक है। उनमें इन मूर्तियों के प्रति एक अलग तरह की आस्था जुड़ी हुई है।

राम पाल ने कहा, लोग मेरी बनाई मूर्तियों को श्रद्धा की नजर से देखते हैं। उनका मानना है कि जो व्यक्ति देख नहीं सकता, वह इतनी सुंदर मूर्तियां केवल मन की आंखों से ही बना सकता है।राम पाल ने बताया कि मूर्तियां बनाना उनके परिवार की रोजी-रोटी का साधन है, लेकिन इससे होने वाली कमाई रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए भी मुश्किल से पर्याप्त होती है। उन्होंने कहा, ‘‘मेहनत और भक्ति को बेचा नहीं जा सकता।

यह कला राम पाल को उनके पिता विनायक कृष्ण पाल से विरासत में मिली, जो खुद भी कुशल मूर्तिकार थे। राम पाल ने बताया कि पिता के साथ काम करते हुए उन्होंने मूर्तियां बनाने की बारीकियां सीखीं।

उनके भाई संजय पाल भी जन्म से दृष्टिहीन थे और इसी काम से जुड़े थे। कोलकाता के एक अस्पताल में उपचार के दौरान उनका निधन हो गया। राम पाल ने बताया कि वह, उनके पिता और संजय—तीनों जन्म से दृष्टिहीन थे। उनके भाई भी मूर्तियां बनाने में उनका हाथ बंटाते थे।राम पाल की पत्नी कंचन पाल भी उनके साथ काम करती हैं।

उनके दो बेटे सौरभ पाल (22) और हृदय पाल (20) गांव में रहकर मिट्टी के बर्तन और दूसरी चीजें बनाते हैं। दंपति की एक बेटी भी है। राम पाल बताते हैं कि मिट्टी से बनी आकृतियों को अंतिम रूप रंगों से मिलता है।

उनकी अनूठी कला को वर्ष 2020 में व्यापक पहचान मिली, जब ‘एशियन पेंट्स’ ने उन्हें ‘शारद सम्मान’ से सम्मानित किया। उनकी कला पर एक वृत्तचित्र भी बनाया गया, जिसमें उनके काम को दिखाया गया और देशभर के दर्शकों तक उनकी कहानी पहुंची।

तमाम पहचान और प्रशंसा के बावजूद राम पाल आज भी उसी काम में जुटे हैं, जिसे उनका परिवार पीढ़ियों से करता आया है। उनकी आंखें भले ही दुनिया को न देख सकीं, लेकिन उनके हाथ उन देवी-देवताओं को आकार देते रहे हैं, जिनकी छवियां वह अपने भीतर संजोए हुए हैं।

SCROLL FOR NEXT