इलाहाबाद हाईकोर्ट  
उत्तर प्रदेश

लखनऊ : 2 प्रोफेसरों की नियुक्ति निरस्तीकरण आदेश रद्द

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रोफेसरों की नियुक्ति को सही ठहराया

Santosh Sharma

लखनऊ : इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने लखनऊ विश्वविद्यालय में दो एसोसिएट प्रोफेसर की नियुक्तियां रद्द करने के कुलाधिपति के आदेश को यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि प्रबंधन और व्यवसाय प्रशासन विषय में नियुक्तियों के लिए निर्धारित विशेष पात्रता मानदंड सामान्य पात्रता नियमों पर प्रभावी होंगे।

न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने बृहस्पतिवार को डॉ. हिमांशु मोहन और डॉ. संगीता साहू की ओर से दायर अलग-अलग याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। अदालत ने दोनों के चयन को सही ठहराते हुए निर्देश दिया कि उन्हें नियुक्ति से जुड़े सभी लाभ दिए जाएं।

दोनों याचिकाकर्ताओं को विश्वविद्यालय के वाणिज्य संकाय के अंतर्गत व्यवसाय प्रशासन विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया गया था। हालांकि, डॉ. रितु नारंग की ओर से नियुक्तियों को चुनौती देते हुए की गई शिकायत के बाद कुलाधिपति ने उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 की धारा 68 के तहत 27 नवंबर 2017 को उनकी नियुक्तियां रद्द कर दी थीं।

कुलाधिपति का मानना था कि अभ्यर्थी ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत करने में विफल रहे, जिनसे यह साबित होता कि उन्होंने शोधार्थियों और डॉक्टरेट के विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया था। विश्वविद्यालय के प्रथम परिनियम के सामान्य प्रावधानों के तहत यह एक अनिवार्य शर्त थी।

पीठ ने अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार ने तीन दिसंबर 2013 से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के 2010 के नियमों को विश्वविद्यालय के प्रथम परिनियम में शामिल कर लिया था। परिनियम 11.03.04(जी) में प्रबंधन और व्यवसाय प्रशासन विषय में नियुक्तियों के लिए विशेष पात्रता मानदंड निर्धारित किए गए थे।

पीठ ने कहा कि ये विशेष प्रावधान सामान्य पात्रता नियमों पर प्रभावी होंगे। व्यवसाय प्रशासन विभाग के वाणिज्य संकाय के अंतर्गत होने के बावजूद विषय-विशिष्ट पात्रता मानदंड निष्प्रभावी नहीं हो जाते।

अदालत ने कहा कि जब चयन समिति ने लागू विशेष प्रावधानों के तहत नियुक्तियां की थीं और संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने की मांग नहीं की थी, तो उम्मीदवारों के वे दस्तावेज जमा नहीं कर पाने के आधार पर उनके चयन को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

पीठ ने माना कि कुलाधिपति का आदेश कानून और तथ्यों की गलत व्याख्या पर आधारित था। इसके बाद अदालत ने आदेश निरस्त करते हुए दोनों याचिकाएं स्वीकार कर लीं।

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