लखनऊ : इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश में विधि विज्ञान प्रयोगशालाओं की कमी पर चिंता जताते हुए कहा है कि राज्य के आकार और आबादी को देखते हुए मौजूदा बुनियादी ढांचा काफी नहीं है।
न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने अधिवक्ता पीयूष गुप्ता द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि राज्य में इस वक्त सिर्फ एक राज्य विधि विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) और 12 क्षेत्रीय फॉरेंसिक प्रयोगशालायें हैं।
पीठ ने उत्तर प्रदेश विधि विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। मामले को 30 नवंबर से शुरू होने वाले सप्ताह में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।
जनहित याचिका में राज्य सरकार को फॉरेंसिक जांच और रिपोर्ट सौंपने के लिए अधिकतम समयसीमा निर्धारित करने वाली मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनाने और अधिसूचित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।
इसमें प्रयोगशालाओं में नमूने प्राप्त होने की तारीख से जांच पूरी करने और रिपोर्ट देने की समयसीमा तय करने की मांग की गई है। याचिका में न्यायिक हिरासत में बंद आरोपियों से जुड़े मामलों को प्राथमिकता देने तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 193(2) के दायरे में आने वाले मामलों के लिए समयबद्ध प्रक्रिया निर्धारित करने का भी अनुरोध किया गया है।
याचिकाकर्ता ने यह सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था बनाने की मांग की है कि निर्धारित समयसीमा से अधिक विलंब होने पर प्रयोगशाला निदेशक लिखित रूप में उसके कारण दर्ज करें। साथ ही, लंबित मामलों की नियमित समीक्षा के लिए एक नामित अधिकारी नियुक्त करने का प्रस्ताव भी रखा गया है।
याचिका में कहा गया है कि फॉरेंसिक रिपोर्ट मिलने में देर होने से विचाराधीन कैदियों के मुकदमों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसमें कहा गया है कि दुष्कर्म और हत्या जैसे गंभीर अपराधों में वैज्ञानिक साक्ष्य समय पर उपलब्ध नहीं होने से अभियोजन की प्रक्रिया प्रभावित होती है और पीड़ितों तथा उनके परिवारों को न्याय मिलने में देरी होती है।