प्रयागराज : भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के कर्मचारियों को जनगणना की ड्यूटी पर लगाने से संबंधित अधिकारियों के निर्देश को सही ठहराते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘नॉर्थ सेंट्रल जोन इंश्योरेंस एम्प्लॉइज’ द्वारा दायर रिट याचिका खारिज कर दी।
अदालत ने कहा कि अधिकृत प्राधिकारी/जोनल अधिकारी द्वारा LIC कर्मचारियों को जनगणना के कार्य के लिए पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्त करने के आदेश में कोई त्रुटि या अवैधता नहीं है।
याचिकाकर्ता यूनियन ने जनगणना के काम के लिए LIC कर्मियों को लगाने के निर्णय को रद्द करने का अनुरोध किया था।
रिट याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति दिनेश पाठक ने कहा, अदालत का विचार है कि अधिकृत प्राधिकारी/जोनल अधिकारी ने जनगणना के काम को सुगम बनाने के लिए पर्यवेक्षक के तौर पर LIC कर्मचारियों की ड्यूटी लगाने का आदेश जारी कर कोई त्रुटि नहीं की है।
अदालत ने कहा,इसके अलावा, रिट याचिका में जनगणना ड्यूटी में LIC कर्मियों की तैनाती के निर्णय को रद्द करने संबंधी अस्पष्ट प्रार्थना की गई है। किसी विशेष आदेश को चुनौती नहीं दी गई है।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 4-ए के तहत, केवल स्थानीय प्राधिकरण के कर्मचारियों को पर्यवेक्षक के तौर पर जनगणना की ड्यूटी में लगाया जा सकता है और एलआईसी स्थानीय प्राधिकरण की परिभाषा के दायरे में नहीं आती।
वहीं दूसरी ओर, भारत सरकार के वकील ने दलील दी कि अधिनियम की धारा 4-ए को अलग से नहीं पढ़ा जा सकता और इसे अधिनियम की धारा 6(1) (ई) और 7(सी) के साथ संयुक्त रूप से पढ़ा जाना चाहिए जो स्पष्ट करती है कि कारखानों, फर्मों और प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों को जनगणना के कार्य में लगाया जा सकता है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि एलआईसी वाणिज्यिक प्रतिष्ठान के दायरे में आती है, इसलिए इसके कर्मचारियों को जनगणना के काम में लगाना, इस अधिनियम के दायरे में है। इसके अलावा, जनगणना नियम, 1990 का नियम तीन उन अधिकारियों का वर्ग स्पष्ट करता है जिन्हें जनगणना अधिकारी के तौर पर नियुक्त किया जा सकता है।
अदालत ने 29 मई के अपने निर्णय में कहा, कानूनी प्रस्ताव की पृष्ठभूमि में अधिकृत प्राधिकारी/जोनल अधिकारी, एलआईसी में नियुक्त व्यक्तियों को जनगणना कार्य के लिए पर्यवेक्षक के तौर पर लगाने का आदेश देने के लिए सक्षम है।