देश में लगातार गिरते बाल लिंगानुपात को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता व्यक्त की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि आजादी के 75 वर्ष बाद भी बेटियों के जन्म, सुरक्षा और समान अधिकारों को लेकर समाज में मौजूद भेदभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक सामाजिक सोच में व्यापक बदलाव नहीं आता, तब तक लिंग चयन और भ्रूण हत्या जैसी कुप्रथाओं को रोकने के लिए कानूनों का सख्ती से पालन जरूरी रहेगा।
जस्टिस Sanjay Karol और Prashant Kumar Mishra की पीठ ने सुनवाई के दौरान जनगणना के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि देश में बाल लिंगानुपात लगातार गिरावट की ओर रहा है।
अदालत के अनुसार 1991 में बाल लिंगानुपात : 945 था जो 2001 में घटकर : 927 और 2011 में और गिरकर 919 पर पहुंच गया। पीठ ने कहा कि यह आंकड़े केवल संख्या नहीं हैं, बल्कि समाज में बेटियों के प्रति मौजूद मानसिकता का प्रतिबिंब हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गिरता लिंगानुपात इस बात का स्पष्ट संकेत है कि समाज के कई हिस्सों में आज भी लड़कों को प्राथमिकता दी जाती है।
अदालत के मुताबिक, यह स्थिति अवैध लिंग चयन और भ्रूण हत्या जैसी गतिविधियों की मौजूदगी की ओर भी इशारा करती है। कोर्ट ने माना कि सरकार विभिन्न योजनाओं के जरिए इस मानसिकता को बदलने की कोशिश कर रही है, लेकिन चुनौती अभी भी बड़ी है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार की विभिन्न योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि बेटियों के प्रति भेदभाव खत्म करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
कोर्ट ने विशेष रूप से Beti Bachao Beti Padhao और Ladli Laxmi Yojana का उल्लेख किया। हालांकि, अदालत ने कहा कि केवल योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि समाज की सोच में स्थायी बदलाव भी उतना ही आवश्यक है।
पीठ ने टिप्पणी की कि आज भी सार्वजनिक स्थलों पर लड़कियों की सुरक्षा और शिक्षा से जुड़े जागरूकता विज्ञापन दिखाई देते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि स्थिति में सुधार तो हुआ है, लेकिन अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
अदालत ने कहा कि वास्तविक लैंगिक समानता तभी स्थापित होगी, जब किसी परिवार में बेटी के जन्म को लेकर कोई सवाल या भेदभाव नहीं होगा।
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए महिलाओं के सम्मान पर जोर दिया। पीठ ने मनुस्मृति के प्रसिद्ध श्लोक "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता" का उल्लेख किया, जिसका अर्थ है कि जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास होता है।
इसके अलावा अदालत ने हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध कवयित्री Subhadra Kumari Chauhan की चर्चित रचना ‘बालिका का परिचय’ का भी संदर्भ दिया।
यह मामला एक डॉक्टर द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम (PCPNDT Act) की धारा 23 के तहत दंडनीय अपराधों के मामले में पारित आदेश को चुनौती दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि लिंग चयन और भ्रूण हत्या जैसे अपराधों पर रोक लगाने के लिए कानूनी कठोरता जरूरी है। अदालत ने दोहराया कि न्यायपालिका का उद्देश्य केवल कानून लागू करना नहीं, बल्कि महिलाओं और बालिकाओं के प्रति भेदभावपूर्ण सोच को समाप्त करने में भी योगदान देना है।
शीर्ष अदालत की टिप्पणी केवल एक कानूनी मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के लिए एक व्यापक संदेश है। कोर्ट ने साफ कहा कि बेटियों को बराबरी का अधिकार देना केवल संवैधानिक दायित्व नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। जब तक महिलाओं को कमजोर समझने वाली सोच पूरी तरह समाप्त नहीं होती, तब तक कानून और जागरूकता दोनों की भूमिका अहम बनी रहेगी।