फाइल फोटो  
टॉप न्यूज़

क्यों स्वदेशी को आगे बढ़ाना अपरिहार्य, आर्थिक समीक्षा में सरकार ने बताया

भारत में स्वदेशी नीतियों पर ध्यान देना अपरिहार्य और आवश्यक है। संसद में बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा में यह कहा गया।

नई दिल्लीः बढ़ते निर्यात नियंत्रण, विकसित देशों के प्रौद्योगिकी देने से इनकार और कार्बन कर व्यवस्था वास्तव में वैश्वीकरण के अंत का संकेत दे रहे हैं। ऐसे में भारत में स्वदेशी नीतियों पर ध्यान देना अपरिहार्य और आवश्यक है। संसद में बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा में यह कहा गया।

वित्त वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि भारत को आयात प्रतिस्थापन, रणनीतिक मजबूती और रणनीतिक अनिवार्यता की अपनी निकट, मध्यम और दीर्घकालिक नीतिगत प्राथमिकताओं को एक साथ आगे बढ़ाना होगा।

समीक्षा के अनुसार, ‘‘समय बर्बाद करने का कोई समय नहीं है। यह एक ही समय में मैराथन और तेजी से दौड़ने जैसा है या मैराथन को ‘स्प्रिंट’ (तेजी से दौड़ना) की तरह दौड़ना है।’’ इसमें कहा गया है कि वर्तमान में कोई भी देश ऐसे वातावरण में काम कर रहा है जहां कच्चा माल, प्रौद्योगिकी और बाजारों तक पहुंच को निर्बाध या स्थायी नहीं माना जा सकता है। निर्यात नियंत्रण, प्रौद्योगिकी प्रतिबंध, कार्बन सीमा तंत्र और पश्चिम एवं पूर्व दोनों देशों की औद्योगिक नीतियां सीधे तौर पर वैश्वीकरण की समाप्ति का संकेत है।

आर्थिक संप्रभुता को सुदृढ़ करने के लिए स्वदेशी जरूरी

आर्थिक समीक्षा में कहा गया, ‘‘ऐसी परिस्थितियों में स्वदेशी एक रक्षात्मक और आक्रामक नीतिगत साधन बन जाता है।’’ यह बाहरी झटकों के बावजूद उत्पादन की निरंतरता सुनिश्चित करने का एक माध्यम है और आर्थिक संप्रभुता को सुदृढ़ करने वाली स्थायी राष्ट्रीय क्षमताओं के निर्माण का रास्ता साफ करता है।’’ सवाल अब यह नहीं है कि राज्य को स्वदेशी को प्रोत्साहित करना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि दक्षता, नवाचार या वैश्विक एकीकरण को कमजोर किए बिना ऐसा कैसे किया जाए।

पीएम मोदी का स्वदेशी पर जोर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बार-बार लोगों और उद्योगों दोनों से स्वदेशी (स्थानीय स्तर पर विनिर्मित) उत्पादों को अपनाने का आह्वान किया है। सरकार ने चीन जैसे देशों पर आयात निर्भरता को कम करने के लिए घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने को लेकर कई उपाय किए हैं। समीक्षा में कहा गया है कि आयात प्रतिस्थापन के सभी तरीके वांछनीय नहीं हैं और संरक्षण के सभी रूप दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धी क्षमता का समर्थन नहीं करते हैं।

समीक्षा में कहा गया, ‘‘स्वदेशी एक अनुशासित रणनीति है, न कि कोई सर्वव्यापी सिद्धांत।’’ स्थायी संरक्षण उन क्षेत्रों में सही नहीं है जहां भारत पहले से ही लागत-प्रतिस्पर्धी है, जहां बड़े पैमाने पर निर्यात किया जा रहा है, जहां उत्पाद आपूर्ति श्रृंखलाओं में मध्यवर्ती के रूप में कार्य करते हैं, या जहां श्रम-प्रधान उद्योगों के लिए कच्चा माल महत्वपूर्ण हैं।

SCROLL FOR NEXT