नयी दिल्ली : धनतेरस पर भारत में सोना और चांदी खरीदने की परम्परा है। अमीर हो या गरीब, प्रयास करता है कि धनतेरस पर सोने या चांदी का कुछ न कुछ जरूर खरीद ले। लेकिन पिछले दो वर्षों में सोने और चांदी के दामों में जिस तरह की आग लगी, उसके कारण विशेष रूप से मध्यम व निम्न मध्यम वर्ग के लिए सोना खरीदना सपना होने लगा था। इस बार धनतेरस से ठीक पहले सोने और चांदी के दामों में गिरावट रही है। अब लोग दुविधा में हैं कि सोना-चांदी और सस्ते होंगे या उन्हें खरीदने का यह सही समय है?
सोना अपने सर्वकालिक उच्च स्तर या इस साल जनवरी के स्तर से लगभग 20 प्रतिशत नीचे आ चुका है। यह पिछले सप्ताह 1 लाख 38 हजार रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास बंद हुआ। चांदी तो अपने सर्वकालिक 4 लाख 20 हजार रुपये से 50 प्रतिशत से भी ज्यादा लुढ़क चुकी है। शुक्रवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसके दाम 49 डॉलर प्रति औंस से भी नीचे चले गए। रुपये में एक किलो चांदी का दाम 1 लाख 80 हजार को छू गया। हालांकि, सोमवार को दोनों कीमती धातुओं में थोड़ी खरीदारी नजर आई और दोनों के दाम थोड़े संभलते दिखे।
सवाल यह है कि जब सोना और चांदी को सर्वकालिक धातु कहा जाता है, इसमें निवेश सबसे सुरक्षित माना जाता है, तब इनमें इतनी बड़ी गिरावट का कारण क्या है? और यह असमंजस भी है कि क्या इस समय सोना-चांदी में निवेश करना चाहिए या इनके दाम और टूटने का इंतजार करना चाहिए।
सोने के दाम टूटने का सबसे बड़े कारण हैं - लगभग दोगुना हो चुकी कीमतें, चढ़ती ब्याज दरें, महंगा कच्चा तेल और मजबूत डॉलर। सरल भाषा में समझने का प्रयास करते हैं। जहां से बड़े निवेशकों ने सोना खरीदा था, उस स्तर से सोना दोगुना से भी अधिक हो चुका है। इस कारण उनके कुल पोर्टफोलियो में सोने का वेटेज बढ़ गया है। उसे संतुलित करने के लिए बड़े निवेशकों ने थोड़ा मुनाफा वसूली की है।
ईरान-अमेरिका युद्ध के कारण कच्चा तेल उबल रहा है। दुनिया का कोई देश ऐसा नहीं है जिसे अपने परिवहन या कारखानों के लिए पेट्रोल-डीजल की जरूरत न पड़ती हो। स्वाभाविक है कि हर देश के केंद्रीय बैंक को अब तेल खरीदने के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं। इसका बोझ सीधा जनता पर न आए, इस प्रयास में लगभग केंद्रीय बैंक बाकी खर्चे घटाकर तेल खरीदारी का प्रबंध कर रहा है।
युद्ध शुरू हुए लगभग 8 महीने हो चुके हैं तो अधिकांश देशों का तेल भंडार भी निम्नतम स्तर पर है। पहले इस उम्मीद में सब देशों ने अपने भंडार से तेल उपयोग किया कि युद्ध जल्दी ही खत्म हो जाएगा, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। अब सबको अपने तेल के भंडार भी भरने हैं और खपत के लिए भी तेल खरीदना है, इसलिए लगभग सभी केंद्रीय बैंकों ने सोना-चांदी की खरीद रोक दी है। जब बड़े खरीदार नहीं होंगे तो थोड़ा भी बिकवाली दबाव बहुत बड़ी गिरावट ला देता है।
दूसरा, तेल महंगा होने से सब जगह महंगाई और ब्याज दरें बढ़ने लगी हैं। इस कारण विशेष रूप से भारत और चीन में सोने की खरीदारी में मध्यम वर्ग की रुचि थोड़ी कम हुई है। लोग गहनों आदि के लिए पुराने सोने को रिसाइकिल करवा रहे हैं। एक और बड़ा कारण है - डॉलर का मजबूत होना। अमेरिका में महंगाई दर लगभग ढाई प्रतिशत है और बॉन्ड यील्ड 5 प्रतिशत से ज्यादा हो गई है।
ऐसे में महंगाई घटाकर भी बॉन्ड से ढाई प्रतिशत की शुद्ध कमाई मिल रही है। निवेशक वहां पैसा लगा रहे हैं। साथ ही, चीन और अमेरिका में एआई का बुलबुला भी फूट रहा है, एआई कंपनियों के शेयर 40 प्रतिशत तक टूट गए हैं। निवेशक पैसा जुटाने के लिए भी सोना बेच रहे हैं, क्योंकि उसे बेचना सबसे आसान होता है। एआई का बुलबुला फूटने से चिप में लगने वाली चांदी भी गिर रही है।
क्या सोना अभी खरीदना चाहिए? लंबे समय के लिए इसमें अपने वित्तीय सलाहकार की सलाह से निवेश किया जा सकता है। जैसे ही कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर से नीचे खिसकेंगे, सोने में फिर तेजी देखने को मिल सकती है। बड़े अंतरराष्ट्रीय खरीदार अब भी सोने पर बुलिश हैं।