कोलकाता: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों जापान और चीन की यात्रा पर हैं। यह दौरा केवल राजनीतिक और कूटनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जब भी भारत की सांस्कृतिक ‘सॉफ्ट पावर’ की बात होती है, तो उसमें भारतीय सिनेमा का जिक्र अपने आप हो जाता है। खासकर चीन और जापान में, जहाँ बॉलीवुड और भारतीय फिल्मों ने दशकों से लोगों के दिलों को छुआ है।
1946 में आयी निर्देशक वी. शांताराम की 'डॉ. कोटनिस की अमर कहानी' केवल एक फिल्म नहीं थी, बल्कि भारत और चीन के बीच सहयोग, बलिदान और मानवीय रिश्तों का प्रतीक बनी। यह कहानी द्वितीय विश्व युद्ध के समय एक भारतीय डॉक्टर की थी, जो चीन में सेवा करते-करते शहीद हो गए। उस दौर में युद्ध के समय जब भारत और चीन दोनों देश कूटनीतिक निकटता की तलाश कर रहे थे, यह फिल्म सांस्कृतिक पुल साबित हुई। चीनी दर्शकों ने इसे न सिर्फ भावनात्मक रूप से अपनाया बल्कि भारत को एक विश्वसनीय साथी के रूप में भी देखा।
इसी तरह, जापान के साथ भारत के सांस्कृतिक रिश्तों को मजबूती दी 1966 में आयी निर्देशक प्रमोद चक्रवर्ती की फिल्म 'लव इन टोक्यो' ने। हल्की-फुल्की रोमांटिक कॉमेडी होने के बावजूद इस फिल्म ने जापानी संस्कृति, जीवनशैली और आधुनिकता को भारतीय दर्शकों के सामने रखा। दूसरी ओर, जापानी दर्शकों ने भारतीय संगीत और नृत्य की रंगीन दुनिया को करीब से महसूस किया। इस फिल्म का फैशन खासकर ‘लव इन टोक्यो’ स्टाइल हेयरबैंड भारत में क्रेज बन गया, जो यह दिखाता है कि किस तरह सिनेमा दोनों देशों के बीच पॉपुलर कल्चर का आदान-प्रदान कर रहा था।
सत्तर और अस्सी के दशक में राज कपूर, राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की फिल्में चीन और जापान में भी लोकप्रिय होने लगीं। भारतीय फिल्मों के भावुक कथानक, परिवार-केंद्रित कहानियां और संगीत ने एशियाई दर्शकों को पश्चिमी सिनेमा से अलग एक मानवीय अनुभव दिया। यही कारण था कि सोवियत संघ के साथ-साथ चीन और जापान में भी भारतीय फिल्म महोत्सव आयोजित किए जाते थे और वे हाउसफुल हो जाते थे। समकालीन दौर में यह प्रभाव और गहरा हुआ है।
चीन में आमिर खान की 'दंगल' ने 1,200 करोड़ से अधिक की कमाई की, जो भारत से कहीं ज्यादा थी। 'सीक्रेट सुपरस्टार', 'बजरंगी भाईजान' और 'हिंदी मीडियम' जैसी फिल्मों ने भी करोड़ों की कमाई कर यह साबित किया कि भारतीय सिनेमा वहाँ की युवा पीढ़ी से सीधे जुड़ रहा है। जापान में 'मुथु' और हाल ही में एस राजामौली की महान कृति 'आरआरआर' ने रिकॉर्ड तोड़ लोकप्रियता हासिल की। राज कुमार हिरानी की '3 इडियट्स' अब भी जापान और चीन के युवाओं में पसंद की जाती है और शिक्षा प्रणाली पर बहस का आधार बनती है।
आज जब भारत ‘सॉफ्ट पावर’ को कूटनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है, तो फिल्मों की भूमिका और अहम हो जाती है। मोदी की वर्तमान यात्रा केवल व्यापार, तकनीक और सामरिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक रिश्तों की भी मजबूत बुनियाद रख रही है। भारत का यह 'सॉफ्ट पावर' फिल्मों के जरिए लोगों के दिलों को जोड़ने का काम कर रहा है।
इसलिए कहा जा सकता है कि 'डॉ. कोटनिस' से लेकर 'लव इन टोक्यो' और 'द जैपनीज वाइफ' से लेकर 'चाँदनी चौक टू चाइना' तक की सिनेमाई यात्रा केवल मनोरंजन की कहानी नहीं है। यह सांस्कृतिक कूटनीति की वह डोर है, जिसने भारत-चीन और भारत-जापान संबंधों को गहराई और नयी दिशा दी है।