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जवाबदेही के बिना युद्ध, गहराता पश्चिम एशिया संकट

ईरान–अमेरिका–इज़राइल टकराव में कानूनी पेचीदगियां, जवाबदेही तय करना मुश्किल

हैमिल्टन : पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष न केवल मानवीय संकट बन चुका है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून के लिए भी एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। एक महीने पहले अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद शुरू हुआ टकराव अब लंबे गतिरोध में बदल गया है। 28 फरवरी को हुए शुरुआती हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत ने स्थिति को और गंभीर बना दिया।

इसके जवाब में ईरान ने इज़राइल, अमेरिकी ठिकानों और खाड़ी क्षेत्र के बुनियादी ढांचे पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। वर्षों से परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर जारी तनाव अब खुले संघर्ष में बदल चुका है, जबकि कूटनीतिक प्रयास कमजोर पड़ते दिख रहे हैं। जमीनी हालात भी लगातार बिगड़ रहे हैं। दक्षिणी ईरान के मीनाब में एक स्कूल पर कथित अमेरिकी हवाई हमले में कई लड़कियों की मौत ने युद्ध की भयावहता और इसके कानूनी पहलुओं को उजागर किया है। विशेषज्ञों के अनुसार, भविष्य में जांच के दौरान यह तय करना होगा कि क्या वह लक्ष्य पूरी तरह नागरिक था, क्या सैन्य उपयोग हो रहा था और क्या हमले में सावधानियां बरती गईं।

इस संघर्ष के कानूनी आधार पर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि आत्मरक्षा के नाम पर दिए गए तर्क कमजोर हैं, जबकि यदि उद्देश्य शासन परिवर्तन था, तो यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन हो सकता है।

जवाबदेही तय करने में सबसे बड़ी बाधा अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय की सीमित अधिकारिता है, क्योंकि अमेरिका, इज़राइल और ईरान ‘रोम संधि’ के सदस्य नहीं हैं। साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो की संभावना भी कार्रवाई को मुश्किल बनाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध के कानून स्पष्ट हैं—नागरिकों और लड़ाकों में अंतर करना, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और हमले से पहले सावधानी बरतना अनिवार्य है। लेकिन इन नियमों के उल्लंघन पर जिम्मेदारी तय करना अक्सर राजनीतिक और कानूनी जटिलताओं में उलझ जाता है।

अतीत के उदाहरण, जैसे सीरिया और यमन, यह दिखाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करना कितना कठिन है। मौजूदा संकट में भी यही आशंका जताई जा रही है कि बिना जवाबदेही के यह संघर्ष और जटिल होता जाएगा।

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