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ईरान पर अमेरिकी हमले तेज, शांति वार्ता के बीच तनाव और गहराया

होर्मुज जलडमरूमध्य बना टकराव का केंद्र, युद्धविराम पर संकट के बादल

तेहरान/वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी सेना ने दक्षिणी ईरान में मिसाइल ठिकानों और समुद्र में माइन बिछाने की कोशिश कर रही नौकाओं को निशाना बनाते हुए नए हवाई हमले किए हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने इन हमलों को “आत्मरक्षा” की कार्रवाई बताया है और कहा है कि यह कदम क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा के लिए उठाया गया।

यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब कतर की राजधानी दोहा में ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता जारी है। ईरान के शीर्ष प्रतिनिधि, जिनमें संसद प्रमुख मोहम्मद बाकर गालिबाफ, विदेश मंत्री अब्बास अराघची और केंद्रीय बैंक गवर्नर शामिल हैं, संभावित समझौते पर चर्चा के लिए मौजूद हैं। हालांकि ईरानी अधिकारियों का कहना है कि बातचीत में कुछ प्रगति जरूर हुई है, लेकिन किसी ठोस समझौते की संभावना अभी दूर है।

अमेरिकी हमलों का मुख्य निशाना बंदर अब्बास के आसपास का क्षेत्र बताया जा रहा है, जो ईरान का एक प्रमुख नौसैनिक और सामरिक केंद्र है और होर्मुज जलडमरूमध्य के पास स्थित है। यह वही समुद्री मार्ग है जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल आपूर्ति के लिए गुजरता है। ईरान के सरकारी मीडिया के मुताबिक, इस क्षेत्र में कई विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं और एयर डिफेंस सिस्टम को सक्रिय किया गया।

तनाव के इस माहौल में ईरान के सख्त रुख भी सामने आए हैं। देश की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के नए प्रमुख मोहम्मद बाकर जोलगदर ने स्पष्ट कहा कि अमेरिका और इजरायल के खिलाफ लड़ाई में “कोई पीछे हटने का सवाल नहीं है।” उन्होंने इसे ईरान की “मजबूत प्रतिरोध क्षमता” का प्रतीक बताया।

इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया बयान देकर विवाद को और बढ़ा दिया है। उन्होंने मांग की है कि ईरान अपने संवर्धित यूरेनियम को या तो अमेरिका को सौंप दे या अंतरराष्ट्रीय निगरानी में नष्ट करे। ट्रंप के इस बयान से संकेत मिलते हैं कि परमाणु मुद्दा भी वार्ता का अहम हिस्सा बना हुआ है।

सूत्रों के अनुसार, दोहा में चल रही बातचीत में होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने और ईरान की परमाणु सामग्री पर नियंत्रण जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है। इसके साथ ही ईरान के जमे हुए फंड्स को जारी करने का मुद्दा भी बातचीत का हिस्सा है।

हालांकि, इन सबके बीच लगातार हो रहे सैन्य हमले और सख्त बयानबाजी से यह साफ है कि हालात बेहद नाजुक बने हुए हैं। 8 अप्रैल से लागू युद्धविराम पहले ही कमजोर स्थिति में था और अब ताजा हमलों ने इसे और खतरे में डाल दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर दोनों पक्ष जल्द किसी समझौते पर नहीं पहुंचते, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, खासकर तेल बाजार पर गंभीर रूप से पड़ सकता है। फिलहाल दुनिया की नजरें दोहा में जारी बातचीत और आने वाले कूटनीतिक कदमों पर टिकी हैं।

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