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पोक्सो एक्ट के तहत सुनाई गई सजा को बहाल रखा

हाईकोर्ट ने खारिज की अपील

गुजारने पड़ेंगे दस साल जेल में

जितेंद्र, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : हाई कोर्ट के पोर्ट ब्लेयर सर्किट बेंच ने पॉक्सो के मामले में दस साल की कठोर कैद की सजा को बहाल रखा है। पोक्सो एक्ट के तहत 24 साल के एक युवक को यह सजा सुनाई गई थी। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि नाबालिग की सहमति का कोई कानूनी आधार नहीं है। जस्टिस राजर्षि भारद्वाज और जस्टिस ऋतव्रत कुमार मित्र के डिवीजन बेंच ने यह फैसला सुनाया है।

एडवोकेट अमृता पांडे ने बताया कि पोर्टब्लेयर के एक पोक्सो कोर्ट ने रूपेश बेक नामक युवक को यह सजा सुनाई थी। बेंच ने अपने फैसले में रोमियो जूलियट के पहलू पर भी गौर किया है। नाबालिगो के बीच प्रेम संबंध के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में इसका जिक्र किया था। नाबालिगा की उम्र 17 साल से कुछ महीने अधिक थी। अभियुक्त से उसकी मुलाकात 2022 में एक विवाह समारोह में हुई थी। यह मुलाकात रफ़्ता रफ़्ता प्रेम में बदल गई। इसके बाद नाबालिगा अपना घर छोड़कर चली गई और कुछ समय तक अभियुक्त के साथ एक किराए के मकान में रही थी। बीमार पड़ने पर वह एक हेल्थ सेंटर में गई तो पता चला कि वह गर्भवती है। मेडिकल अफसर की शिकायत पर पुलिस ने उसका बयान दर्ज किया था। इसके साथ ही मामला की दायर हो गया। अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद उसे दस साल कैद की सजा सुना दी। अभियुक्त ने इसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। अभियुक्त के एडवोकेट की दलील थी कि उसने अपनी मर्जी से एफआईआर नहीं कराई थी। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि पीड़िता और उसकी माँ के बयान का क्रॉस एग्जामिनेशन नहीं किया गया था। यानी यह मान लिया गया था कि उनके बयान सही है ।इसके साथ ही कोर्ट ने कहा है कि आपसी सहमति का कोई कानूनी आधार नहीं है। लिहाजा यह अपील खारिज की जाती है।

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