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विधानसभा में ओबीसी से संबंधित दो संशोधन विधेयक पारित

पक्ष में 186 वोट पड़े, विरोध में 17 वोट, 6 अनुपस्थित

कोलकाता : ओबीसी या अन्य पिछड़े समुदायों के आरक्षण को लेकर राज्य विधानसभा में सोमवार को दो महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक पारित हो गए। राज्य के पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री गौरीशंकर घोष ने सदन में ये विधेयक पेश किए। शुरुआत में माना जा रहा था कि विधेयकों को ध्वनिमत से पारित कर दिया जाएगा, लेकिन आईएसएफ विधायक नौशाद सिद्दीकी ने इसका विरोध करते हुए मतदान (डिविजन) की मांग की। स्पीकर की मंजूरी मिलने पर कालीघाट तृणमूल ने मतदान में हिस्सा लिया, जबकि ऋतब्रत गुट के विधायकों ने सदन से वॉकआउट कर दिया। मतदान में विधेयकों के पक्ष में 186 वोट पड़े, जबकि विरोध में 17 वोट पड़े, वहीं 6 सदस्य मतदान से अनुपस्थित रहे।

विधेयक पर पक्ष-विपक्ष के तर्क

भाजपा विधायक अरिजीत बक्शी ने आरोप लगाया कि 2010-12 के दौरान बिना वैज्ञानिक सर्वेक्षण के कई समुदायों (अधिकतम मुस्लिम) को वोट बैंक की राजनीति के तहत ओबीसी सूची में शामिल किया गया। उन्होंने इसे "बौद्धिक बेईमानी और संस्थागत भ्रष्टाचार" बताते हुए कहा कि यह संशोधन 14 वर्षों के कानूनी संघर्ष का परिणाम है। वहीं, जयनगर के टीएमसी विधायक विश्वनाथ दास ने कहा कि मुस्लिम तुष्टीकरण की गलती को सुधारने और वास्तविक पिछड़े वर्गों को न्याय दिलाने के लिए यह विधेयक लाया गया है। दूसरी ओर, आईएसएफ विधायक नौशाद सिद्दीकी ने विधेयकों का विरोध करते हुए कहा कि आरक्षण धर्म नहीं, बल्कि निर्धारित मानकों के आधार पर होना चाहिए। तृणमूल विधायक बाबर अली ने भी संशोधन विधेयकों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया।

'हाईकोर्ट के फैसले पर लाया गया विधेयक'

जवाब में मंत्री गौरीशंकर घोष ने कहा, “पिछली सरकार ने अतिरिक्त जातियों को सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए सूचीबद्ध किया था। यह कानून कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के अनुरूप लाया गया है। इस संशोधन से यह नहीं माना जाना चाहिए कि हटाई गई सूची के लोगों को दोबारा शामिल नहीं किया जा सकता। हमने बिना किसी फील्ड सर्वे के पहले शामिल की गई 113 श्रेणियों को सूची से हटा दिया है, जबकि विभिन्न सर्वेक्षणों के आधार पर शामिल की गई 66 उप-श्रेणियों को बरकरार रखा है। यदि आयोग उचित समझेगा तो वह सिफारिश कर सकेगा और उसी के अनुसार कदम उठाए जाएंगे। जब नियमों का पालन किए बिना किसी एक समुदाय के बहुसंख्यक हिस्से को शामिल किया गया था, तब किसी ने सवाल क्यों नहीं उठाया? अब सूची में सिर्फ 66 जातियां हैं।”

विधेयकों की पृष्ठभूमि

सोमवार को जिन दो विधेयकों को पेश किया गया, वे हैं – ‘वेस्ट बंगाल बैकवर्ड क्लासेस (अदर दैन शेड्यूल कास्ट एंड शेड्यूल ट्राइब) रिजर्वेशन ऑफ वैकेंसीज इन सर्विसेज एंड पोस्ट अमेंडमेंट बिल, 2026’ और ‘वेस्ट बंगाल कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लासेस (अमेंडमेंट) बिल, 2026’। नए कानून के तहत तृणमूल सरकार द्वारा कैटेगरी-‘बी’ में जोड़े गए 78 समुदायों वाली अनुसूची-1 को हटा दिया गया है तथा ओबीसी सूची में किसी समुदाय को शामिल करने या हटाने के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग के समक्ष आवेदन और आपत्ति दर्ज कराने की व्यवस्था की गई है। राज्य में रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों के बाद वाममोर्चा सरकार ने ओबीसी आरक्षण लागू किया था। बाद में 2012 में तृणमूल सरकार ने कैटेगरी-‘ए’ में 65 और कैटेगरी-‘बी’ में 78 समुदायों को सूची में शामिल किया। नए विधेयक के तहत आयोग की सिफारिश पर राज्य सरकार आरक्षण का प्रतिशत और वर्गीकरण तय करेगी, जबकि कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। आयोग की सिफारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी होंगी।

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