कोलकाता : पश्चिम बंगाल में एक साथ कई मुश्किलों और चुनौतियों से जूझ रही ममता बनर्जी को अब विधानसभा में नेता विपक्ष के मुद्दे पर बड़ा झटका लगा है। गुरुवार को कलकत्ता हाईकोर्ट ने टीएमसी के बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी को नेता विपक्ष बनाए जाने पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। ममता बनर्जी ने चुनावों के बाद शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता विपक्ष बनाया था, लेकिन उनकी नियुक्ति में विधायकों के फर्जी दस्तखत का आरोप लगा। इसके बाद पार्टी विधायकों में बगावत हुई। उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी को नेता चुना था। ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा अध्यक्ष ने नेता विपक्ष मान लिया था। इस फैसले को ममता बनर्जी ने कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जहां से अब ममता बनर्जी को झटका लगा है।
जस्टिस कृष्णा राव ने इस मामले में कोई अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार कर दिया, जिससे स्पीकर का फैसला अगली सुनवाई तक लागू रहेगा। याचिका में पश्चिम बंगाल विधानसभा स्पीकर द्वारा ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता मानने को चुनौती दी गई थी। टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी शोभनदेब चट्टोपाध्याय को इस पद के लिए चाहती थीं। कोर्ट ने सभी पक्षों को अगली सुनवाई से पहले हलफनामे का आदान-प्रदान पूरा करने का निर्देश दिया। जस्टिस राव ने प्रतिवादियों से तीन सप्ताह के भीतर अपना विरोध-हलफनामा दाखिल करने को कहा, जबकि याचिकाकर्ता को उसके बाद जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया। मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को होनी है। ऋतब्रत बनर्जी पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के 13वें नेता के रूप में कार्यरत हैं।
हाई कोर्ट द्वारा स्पीकर के फैसले पर रोक लगाने से इनकार करने के बाद ऋतब्रत बनर्जी विपक्ष के मान्यता प्राप्त नेता के तौर पर काम करते रहेंगे। ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि उनके साथ टीएमसी के 64 विधायक हैं। पहले उन्होंने 58 विधायका दावा किया था। इसके बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा के स्पीकर रथीन्द्र बोस ने बागी गुट के दावे को स्वीकार कर लिया और ममता बनर्जी खेमे द्वारा समर्थित आधिकारिक उम्मीदवार को दरकिनार करते हुए ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता नियुक्त कर दिया। इसके बाद ममता बनर्जी के गुट ने कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि स्पीकर के फैसले ने आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल को दरकिनार कर दिया और विधायी दल की मान्यता से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन किया है।