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2026 का महासंग्राम : सटीक रणनीति, गठजोड़ और वोट बैंक होगा निर्णायक

चौथी बार जीत की तलाश में तृणमूल, सत्ता पर भाजपा की पैनी नजर क्या छोटे दल बनेंगे किंगमेकर ? SIR : ‘वोट ट्रांसफर’ और ‘वोट कटाव’ से परिणाम हो सकता है दिलचस्प

सबिता राय, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : पश्चिम बंगाल में 2026 का विधानसभा चुनाव बेहद ही अलग अंदाज में नजर आ रहा है। राजनीतिक पार्टियों की नोकझोंक, वादे, आरोप-प्रत्यारोप तो हर चुनाव में ही लगते आये हैं मगर इस बार SIR प्रक्रिया इसे अन्य चुनावों से अलग करती नजर आ रही है। वोट ट्रांसफर और वोट कटाव से परिणाम दिलचस्प हो सकता है। बहरहाल, राजनीतिक गलियारों में भी इस चुनाव को अलग रूप से देखा जा रहा है। विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर सियासी सरगर्मी चरम पर पहुंच गई है। सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है और अब चुनावी प्रचार का शोर भी तेज हो गया है। राज्य की सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस लगातार चौथी बार जीत दर्ज करने के लक्ष्य के साथ चुनावी मैदान में एड़ी चोटी का जोर लगा रही है, जबकि मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा इस बार सत्ता परिवर्तन के इरादे से पूरी ताकत झोंक रही है। भाजपा को भरोसा है कि बंगाल में इस बार कमल खिलेगा। वहीं तृणमूल अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं, महिला सशक्तीकरण और ग्रामीण विकास के मुद्दों को चुनावी हथियार बना रही है। पार्टी का दावा है कि बीते वर्षों में किए गए कार्यों के आधार पर उसे जनता का समर्थन मिलेगा। दूसरी ओर भाजपा हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण, शहरी क्षेत्रों में अपनी पकड़,भ्रष्टाचार के मुद्दे, महिला सुरक्षा सहित कई मुद्दों के साथ मैदान में है। इसके अलावा माना जा रहा है कि आईएसएफ और हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी भी कुछ सीटों पर प्रभाव डालने की स्थिति में हैं। ऐसे में 2026 का चुनाव पूरी तरह से रणनीति, गठजोड़ और वोट बैंक के संतुलन पर निर्भर कर सकता है। अब सबकी नजर 4 मई 2026 पर टिकी है, जब यह साफ हो जाएगा कि बंगाल की सत्ता किसके हाथों में जाएगी।

हिन्दी भाषी निर्णायक भूमिका में...अगर वोट बैंक के गणित की बात करें तो 30 % अल्पसंख्यक मतदाताओं को लुभाने की होड़ है। वहीं हिंदू वोट, जो राज्य में बहुसंख्यक हैं, वह किसी भी पार्टी के भाग्य को बदल सकता है। इनमें कोलकाता की सभी 11 सीटों पर ही हिन्दीभाषी अच्छी खासी संख्या में हैं। हावड़ा, हुगली, उत्तर 24 परगना, शिल्पांचल, सिलीगुड़ी, चायबागान क्षेत्रों से लेकर कई सीटों पर हिन्दी भाषी निर्णायक भूमिका में हैं। हिंदीभाषी मतदाता, खासकर शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में इस चुनाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

एक नजर 2021 चुनाव के नतीजे पर

तृणमूल : सीट 215, वोट 48.0%

भाजपा : सीट 77, वोट 38.1%

अन्य : सीट: 02, वोट 10 %

छोटे क्षेत्रीय दलों की भूमिका अहम

मुख्य मुकाबला भले ही तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच माना जा रहा हो, लेकिन इस बार छोटे दलों की भूमिका भी बेहद अहम होती दिख रही है। कई सीटों पर इन दलों का प्रभाव सीधे-सीधे जीत-हार का गणित बदल सकता है। वहीं माना जा रहा है कि राज्य में आईएसएफ (ISF), हुमायूं कबीर की पार्टी का एआईएमआईएम के साथ गठबंधन मुर्शिदाबाद व मालदा में कांग्रेस की फिर से सक्रियता चुनावी समीकरण के लिए दिलचस्प हो सकता है। खासकर उन इलाकों में जहां मुकाबला कड़ा है, वहां कुछ हजार वोट भी परिणाम पलट सकते हैं।

वाम और कांग्रेस अपनी खोयी जमीन पाने की कोशिश में जुटी

कभी 34 साल तक बंगाल की सत्ता पर काबिज रहे वाममोर्चा का 2011 के बाद से चुनावी ग्राफ बिगड़ता गया। वर्तमान में आलम यह है कि बंगाल में उसके एक भी विधायक नहीं है लेकिन कहते हैं न कि आस कभी छोड़नी नहीं चाहिए। इस बार भी वाममोर्चा ने अपने उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। आईएसएफ से सहयोग से क्या परिणाम आते हैं यह तो 4 मई को ही पता चल पायेगा। दूसरी ओर कांग्रेस भी अपनी खोयी जमीन वापस पाने की कोशिश में जुटी हैं। यह अलग बात है कि वह अब तक अपने उम्मीदवार नहीं दे सकी है।

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