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फलता री-इलेक्शन: TMC के लिए क्यों बना प्रतिष्ठा का सवाल

अभिषेक बनर्जी के गढ़ पर टिकी नजरें, टीएमसी इतनी आक्रामक और ‘पजेसिव’ क्यों?

प्रसेनजीत, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : पश्चिम बंगाल की राजनीति में फलता अब सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं रह गई है, बल्कि यह तृणमूल कांग्रेस के लिए राजनीतिक प्रतिष्ठा, संगठनात्मक ताकत और अभिषेक बनर्जी के ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ की परीक्षा का प्रतीक बन चुकी है। यही वजह है कि पुनर्मतदान (री-पोल) की घोषणा के बाद टीएमसी का पूरा शीर्ष नेतृत्व असामान्य रूप से आक्रामक दिख रहा है। दरअसल, फलता दक्षिण 24 परगना के उस राजनीतिक भूगोल का हिस्सा है जिसे अभिषेक बनर्जी का मजबूत गढ़ माना जाता है। पिछले एक दशक में यहां संगठन विस्तार, स्थानीय नेटवर्क, सामाजिक कार्यक्रमों और बूथ स्तर की पकड़ को टीएमसी अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करती रही है। इसलिए पार्टी मानती है कि यदि इस क्षेत्र में भाजपा चुनावी सेंध लगाती है, तो उसका राजनीतिक संदेश पूरे बंगाल में जाएगा।

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब चुनाव आयोग ने 29 अप्रैल को हुए मतदान को रद्द कर सभी 285 बूथों पर दोबारा मतदान कराने का आदेश दे दिया। आयोग ने इसे “गंभीर चुनावी अनियमितताओं” से जुड़ा मामला बताया। भाजपा ने आरोप लगाया कि कई बूथों पर ईवीएम से छेड़छाड़, मतदाताओं को धमकाने, बूथों के भीतर अनधिकृत लोगों की मौजूदगी और सीसीटीवी फुटेज गायब होने जैसी घटनाएं हुईं। शिकायतों में यह भी कहा गया कि कुछ दलों के बटन टेप से ढके गए और मतदाताओं की पसंद जानने के लिए इत्र जैसी चीजों का इस्तेमाल किया गया।

भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने सोशल मीडिया पर इन आरोपों को उठाते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान का बचाव करने का आरोप लगाया। वहीं हाशिमनगर गांव के कुछ लोगों ने स्थानीय टीएमसी नेताओं पर धमकी देने के आरोप लगाए। इन घटनाओं के बाद चुनाव आयोग ने 21 मई को री-पोल और 24 मई को मतगणना की घोषणा की है। साथ ही केंद्रीय बलों, रैफ और व्यापक वीडियोग्राफी के निर्देश भी दिए गए हैं। टीएमसी की चिंता सिर्फ एक सीट हारने की नहीं, बल्कि उस नैरेटिव को बचाने की है जिसके तहत पार्टी दावा करती है कि भाजपा केंद्रीय एजेंसियों, केंद्रीय बलों और “गोडी मीडिया” के सहारे बंगाल में राजनीतिक बढ़त बनाना चाहती है। यही कारण है कि अभिषेक बनर्जी, सुष्मिता देव और चंद्रिमा भट्टाचार्य जैसे नेताओं के बयान लगातार “बाहरी ताकत बनाम बंगाल” की राजनीति पर केंद्रित हैं।

साथ ही, फलता की सांप्रदायिक सौहार्द वाली छवि को भी टीएमसी लगातार उभार रही है। पार्टी का दावा है कि भाजपा यहां धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं कर पाएगी। इसलिए फाल्टा अब सिर्फ उपचुनाव नहीं, बल्कि टीएमसी के लिए राजनीतिक सम्मान, संगठनात्मक विश्वसनीयता और बंगाल की क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई बन चुका है, जिसे टीएमसी किसी भी सूरत में खोना नहीं चाहता, भले ही पूरे राज्य के सत्ता का बागडोर हाथ से क्यों ना फीसल जाए।

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