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डीम्ड यूनिवर्सिटी पर स्पष्टीकरण से मचा नया भ्रम

छात्रों और शैक्षणिक समुदाय में नई उलझन, प्रशासन का जवाब विवादित बना

डीम्ड यूनिवर्सिटी के फैसले पर स्थानीय छात्रों की मुख्य मांग अभी भी अनसुलझी

सन्मार्ग संवाददाता

श्री विजयपुरम : अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के कॉलेजों में डीम्ड यूनिवर्सिटी के विरोध में जारी छात्र प्रदर्शनों के बीच अंडमान एवं निकोबार प्रशासन ने मंगलवार शाम प्रश्न-उत्तर शैली में एक विस्तृत प्रेस विज्ञप्ति जारी कर स्पष्टीकरण देने का प्रयास किया। हालांकि, इस स्पष्टीकरण से चिंताएं शांत होने के बजाय छात्रों और शैक्षणिक समुदाय के बीच नई उलझन और अनेक नए सवाल खड़े हो गए हैं।

यह प्रेस बयान नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंस्टीट्यूट ऑफ हायर लर्निंग के अंतर्गत कॉलेजों के प्रदर्शनकारी छात्र प्रतिनिधिमंडल और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच हुई बैठक के बाद जारी किया गया। दस्तावेज़ में फीस, इंफ्रास्ट्रक्चर, परीक्षा और फंडिंग जैसे मुद्दों पर जवाब दिए गए, लेकिन जिन सवालों को प्रदर्शनकारी “मूल प्रश्न” बता रहे हैं—कि द्वीपों में डीम्ड यूनिवर्सिटी की मांग किसने की और पांडिचेरी यूनिवर्सिटी से पुरानी संबद्धता क्यों समाप्त की गई—उनका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया गया। प्रशासन के अनुसार फीस में कोई बढ़ोतरी नहीं होगी और वर्तमान नाममात्र शुल्क संरचना जारी रहेगी, साथ ही संस्थान को केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन की अनुदान सहायता मिलती रहेगी। यह भी आश्वासन दिया गया कि मौजूदा कॉलेजों का इंफ्रास्ट्रक्चर वापस नहीं लिया जाएगा और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए अतिरिक्त सुविधाएं विकसित की जाएंगी। छात्रों को मिलने वाली वर्तमान स्टाइपेंड व्यवस्था भी बिना किसी रुकावट जारी रखने की बात कही गई। दीर्घकालिक स्थिरता के सवाल पर अधिकारियों ने कहा कि प्रारंभिक पांच वर्षों के बाद भी प्रशासन डीम्ड यूनिवर्सिटी को वित्तीय सहायता देता रहेगा। वर्ष 2025-26 के बैच की परीक्षाओं और मूल्यांकन के संबंध में बताया गया कि यह प्रक्रिया नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंस्टीट्यूट ऑफ हायर लर्निंग द्वारा पांडिचेरी यूनिवर्सिटी या किसी अन्य मेंटर संस्थान की मदद से औपचारिक समझौते के तहत कराई जाएगी।

विज्ञप्ति में यह भी रेखांकित किया गया कि यूजीसी नियमों के अनुसार राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद मान्यता और नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क रैंकिंग में भागीदारी अनिवार्य होगी तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के मानकों को शोध प्रोत्साहन, उद्योग-अनुकूल पाठ्यक्रम और पारदर्शी शैक्षणिक प्रक्रियाओं के माध्यम से बनाए रखा जाएगा। साथ ही यह दावा किया गया कि नई व्यवस्था से छात्रों का द्वीपों से बाहर पलायन कम होगा और स्थानीय स्तर पर शोध के अधिक अवसर उपलब्ध होंगे। इन आश्वासनों के बावजूद प्रदर्शनकारी छात्र और कई सामाजिक संगठन मानते हैं कि यह स्पष्टीकरण मूल संरचनात्मक बदलाव के पीछे के तर्क को स्पष्ट नहीं करता। उनका कहना है कि प्रशासन ने फीस और स्टाइपेंड जैसे संचालन संबंधी मुद्दों पर जवाब तो दिया है, लेकिन निर्णय प्रक्रिया, परामर्श तंत्र और शैक्षणिक औचित्य पर चुप्पी साध ली है। विभिन्न परिसरों में प्रदर्शन जारी रहने के बीच यह ताजा प्रेस विज्ञप्ति असंतोष कम करने में नाकाफी साबित होती दिख रही है, जबकि छात्र संगठनों की मुख्य मांग अब भी स्पष्ट मंशा और दीर्घकालिक शैक्षणिक विश्वसनीयता पर जवाब ही बनी हुई है।

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