कोलकाता : साल के अंत में पश्चिम बंगाल की नौकरशाही ने एक नया इतिहास रचा, जब पूर्व गृह सचिव नंदिनी चक्रवर्ती को राज्य की पहली महिला मुख्य सचिव नियुक्त किया गया। यह नियुक्ति केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के शासनकाल में शीर्ष नौकरशाही के बदलते चरित्र और नेतृत्व मॉडल का प्रतीक मानी जा रही है। इसी पृष्ठभूमि में जीडी गौतम (2010-12) से लेकर पूर्व मुख्य सचिव मनोज पंत (2024-25) तक की यात्रा को समझना और भी प्रासंगिक हो जाता है। सूत्रों के अनुसार, ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद राज्य की शीर्ष नौकरशाही केवल प्रशासनिक ढांचे तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह राजनीतिक-प्रशासनिक संतुलन का एक सक्रिय औजार बनकर उभरी।
ममता बनर्जी के शासनकाल के शुरुआती दौर में जीडी गौतम के समय प्रशासन अपेक्षाकृत पारंपरिक ढांचे में काम करता दिखा, जहां नौकरशाही की भूमिका नीति-निर्माण और क्रियान्वयन तक सीमित थी। इसके बाद वासुदेव बनर्जी और मलय दे जैसे मुख्य सचिवों ने प्रशासनिक निरंतरता, वित्तीय अनुशासन और विभागीय समन्वय को मज़बूती दी। यह वह समय था जब तृणमूल सरकार संस्थागत रूप से खुद को स्थापित कर रही थी और शासन में स्थिरता सर्वोपरि थी। जैसे-जैसे ममता बनर्जी की राजनीतिक पकड़ मजबूत हुई, वैसे-वैसे नौकरशाही की भूमिका भी बदली। आलापन बंद्योपाध्याय के कार्यकाल में यह बदलाव निर्णायक रूप से सामने आया। चक्रवात अम्फान, कोविड-19 महामारी और केंद्र-राज्य टकराव के दौरान उनका आपदा प्रबंधन और मुख्यमंत्री के साथ सीधा समन्वय तृणमूल शासन मॉडल की पहचान बन गया। एच.के. द्विवेदी ने कानून-व्यवस्था और चुनावी प्रबंधन को प्राथमिकता दी, जबकि बी.पी. गोपालिका ने सेवा वितरण और प्रशासनिक निगरानी तंत्र को सुदृढ़ किया।
हाल के समय में जब पूर्व सीएस डॉ. मनोज पंत ने नवान्न की 13वीं मंजिल का कार्यभार संभाला, तब राज्य चुनावी दबाव, केंद्र के साथ टकराव और प्रशासनिक जवाबदेही की चुनौती से जूझ रहा था। ऐसे में डॉ. पंत ने अपनी प्रतिष्ठा के साथ न्याय करने की पूरी कोशिश की। वहीं, नंदिनी चक्रवर्ती की पदोन्नति यह संकेत देती है कि ममता बनर्जी भरोसेमंद, निर्णायक और संवेदनशील अफसरों को नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति में लाने के अपने मॉडल पर कायम हैं। स्पष्ट है कि जीडी गौतम से मनोज पंत और अब नंदिनी चक्रवर्ती तक का सफर, पश्चिम बंगाल की शीर्ष नौकरशाही को फिर से परिभाषित करने की कहानी है।