पश्चिम बंगाल विधानसभा के प्रिंसिपल सेक्रेटरी सोमेन्द्र नाथ दास  
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अभिषेक बनर्जी के पत्र पर विधानसभा सचिवालय ने उठाये सवाल

रेजोल्यूशन कॉपी और मिनट्स नहीं मिलने से अटका फैसला, नेता प्रतिपक्ष की मान्यता पर मुद्दा गरमाया

सबिता, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता के पद को लेकर पैदा हुई कानूनी जटिलता पर पश्चिम बंगाल विधानसभा के प्रिंसिपल सेक्रेटरी सोमेन्द्र नाथ दास ने बुधवार काे प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि तृणमूल कांग्रेस की तरफ से अभिषेक बनर्जी का एक पत्र मिला है लेकिन इसके साथ विधायकों के हस्ताक्षर वाले पत्र की कॉपी हमें प्राप्त नहीं हुई है जो सबसे ज्यादा जरूरी और मान्य है। अभिषेक बनर्जी के पत्र में तारीख और मीटिंग को लेकर कुछ भी उल्लेख नहीं है। प्रिंसिपल सेक्रेटरी ने स्पष्ट किया है कि अभिषेक बनर्जी ने विधानसभा अध्यक्ष को एक पत्र भेजा था। इस पत्र में बताया गया था कि सर्वसम्मति से शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विधानसभा में विपक्ष का नेता चुना गया है। इसके साथ ही विपक्ष के डिप्टी लीडर के रूप में असीमा पात्र और नयना बंद्योपाध्याय के नाम भेजे गए, जबकि चीफ व्हीप के तौर पर फिरहाद हकीम का नाम प्रस्तावित किया गया। हालांकि विवाद इस बात को लेकर शुरू हुआ कि पत्र के साथ पार्टी बैठक का कोई आधिकारिक प्रस्ताव (रेजोल्यूशन कॉपी) या बैठक की कार्यवाही (मिनट्स) संलग्न नहीं की गई थी। इसी वजह से विधानसभा के स्पीकर रथींद्र बोस इस पत्र के आधार पर कोई अंतिम निर्णय नहीं ले सके।

विपक्ष के नेता को मान्यता देने का अंतिम अधिकार स्पीकर के पास

विधानसभा सचिवालय ने अभिषेक बनर्जी को जवाबी पत्र भेजकर संबंधित बैठक की रेजोल्यूशन कॉपी और मिनट्स जमा करने का अनुरोध किया है। यह भी स्पष्ट किया कि यह कोई राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि पूरी तरह कानूनी और प्रक्रियागत मामला है। प्रिंसिपल सेक्रेटरी ने बताया कि ‘Bengal Legislative Assembly Members Emolument Act 1937’ के ‘Explanation 2’ के अनुसार विपक्ष के नेता को मान्यता देने का अंतिम अधिकार विधानसभा स्पीकर के पास होता है। वे यह तय कर सकते हैं कि किसी दावे की पुष्टि के लिए कौन-कौन से दस्तावेज आवश्यक हैं। सचिवालय ने इस संदर्भ में इतिहास का उदाहरण भी दिया। पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के समय भी इसी प्रकार की स्थिति उत्पन्न हुई थी। इसी कारण वर्तमान स्पीकर भी नियमों से हटकर जल्दबाजी में कोई फैसला लेने के पक्ष में नहीं हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में नयी बहस छेड़ दी है।

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