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लुप्त हो रही है बंगाल के नलेन गुड़ की सुगंध

संकटग्रस्त खजूर गुड़ बनाने की परंपरा को बचाने के सरकारी प्रयास

कोलकाता: शीत ऋतु और बंगाल के खजूर के गुड़ की सुगंध एक-दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। सदियों पुरानी इस मिठास का सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पोषण मूल्य निरंतर चर्चा में रहा है। ताजा खजूर के रस से तैयार यह नलेन गुड़ न सिर्फ बंगाल की पारंपरिक मिठाइयों की जान है, बल्कि अब दही, केक और आइसक्रीम जैसे आधुनिक खाद्य उत्पादों में भी अपनी जगह बना चुका है।

'नलेन' नाम कहां से आया?

'नलेन गुड़' का अर्थ है 'नया गुड़', क्योंकि इसे हर वर्ष शीत ऋतु की शुरुआत में खजूर के ताजा रस से बनाया जाता है। इसका नाम 'नया' अर्थ वाले शब्द से जुड़ा माना जाता है, जो इसे साधारण गुड़ से अलग पहचान देता है। एक मान्यता यह भी है कि इसका संबंध दक्षिण भारत के एक प्राचीन शब्द से है, जिसका अर्थ काटना या छेदन करना है यानी रस निकालने की पारंपरिक प्रक्रिया।

सर्द हवाओं में घुली विरासत

इतिहासकारों के अनुसार खजूर के गुड़ का उल्लेख लगभग 800 वर्ष पुराने संस्कृत ग्रंथ 'सदूक्तिकर्णामृत' में मिलता है। माना जाता है कि भारतीय और बाद में पुर्तग़ाली नाविकों ने इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि खजूर का रस कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, पोटैशियम और विटामिन बी से भरपूर होता है, जबकि गुड़ में आयरन, कैल्शियम और जिंक की मात्रा अधिक पाई जाती है। कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स के कारण यह चीनी से अधिक स्वास्थ्यकर माना जाता है।

खजूर के गुड़ का संघर्ष

परंपरागत तकनीक से बनने वाला यह गुड़ पिछले कुछ वर्षों में चुनौतियों का सामना कर रहा है। खजूर के वृक्षों की कमी, अनुभवी कारीगरों की घटती संख्या, अल्प-सीजन उत्पादन, बढ़ती लागत और जलवायु परिवर्तन के कारण रस की मात्रा में तेज गिरावट आई है। रिपोर्टों में बताया गया है कि पिछले दशक में रस का स्राव लगभग आधा रह गया है, जिससे मांग के मुकाबले आपूर्ति कम पड़ रही है।

राज्य सरकार की नयी पहल

इस स्थिति को देखते हुए पश्चिम बंगाल सरकार ने संरक्षण और आधुनिकीकरण की पहल तेज कर दी हैं। नदिया जिले में आधुनिक प्रयोगशाला-सहित उत्पादन केंद्र स्थापित किया गया है, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं और उच्च गुणवत्ता वाला उत्पाद तैयार हो रहा है। पहली बार खजूर के गुड़ की ट्यूब-पैकिंग कर देश–विदेश भेजने की व्यवस्था भी शुरू की गई है। इसके साथ ही मिलावट रोकने के लिए कड़ी निगरानी लागू की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार की यह पहल उत्पादन को नई दिशा देगी। इस विरासत को संरक्षित रखने में उपभोक्ताओं और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी भी अनिवार्य है।

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