सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : भारत-बांग्लादेश सीमा पर बढ़ते तनाव के बीच एक नई डॉक्यूमेंट्री ‘विंग्स ऑफ़ डिफायंस’ रिलीज होने जा रही है, जिसमें 1971 के बांग्लादेश युद्ध के दौरान बांग्लादेश एयर फ़ोर्स के जन्म और ऑपरेशन किलो फ्लाइट की कहानी दिखाई गई है। डॉक्यूमेंट्री में यह दिखाया गया है कि कैसे "बांग्लादेश ने उड़ना सीखा, लेकिन भारत ने उसे पंख दिए।" ऑपरेशन किलो फ्लाइट, जिसे मुक्ति वाहिनी के कॉम्बैट एविएशन फॉर्मेशन का कोड नाम दिया गया था, 1971 में दीमापुर के एक सुनसान एयरस्ट्रिप से शुरू हुआ। इस मिशन ने सीमित संसाधनों में भी साहसिक हमलों को अंजाम देकर बांग्लादेश एयर फोर्स की नींव रखी। डॉक्यूमेंट्री के निर्देशक अभिजीत दासगुप्ता ने बताया कि यह उनके 1971 के बांग्लादेश युद्ध पर बनाई गई डॉक्यूमेंट्री सीरीज़ की दूसरी कड़ी है। उनका कहना है, “यह सीरीज़ इतिहास को भुलाने की किसी भी कोशिश के खिलाफ़ विरोध है। जब इतिहास मिटा दिया जाता है, तो युवा पीढ़ी से सवाल पूछने की क्षमता छिन जाती है। यह डॉक्यूमेंट्री उन्हें वह ज्ञान देती है जो उन्हें होना चाहिए।”
‘विंग्स ऑफ डिफायंस’ का प्रीमियर 15 जनवरी को SRFTI में होगा। दासगुप्ता के अनुसार, यह डॉक्यूमेंट्री उनके पहले प्रोजेक्ट ऑपरेशन जैकपॉट की कहानी को आगे बढ़ाती है, जिसमें पाकिस्तानी तेल डिपो पर सफल हमले और रातों-रात पाकिस्तान की युद्ध मशीन को पंगु बनाने की घटना को दर्शाया गया।
निर्देशक ने रिसर्च में समय लगाया और “गुप्त मिशन की धड़कन” और उसके खतरनाक परिणामों को पकड़ने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सर्चलाइट के बाद बंगाली डिफेक्टर पायलटों और इंडियन एयर फ़ोर्स के अधिकारियों ने दीमापुर में एक सीक्रेट एयर मिशन तैयार किया। इसमें सिंगल-इंजन वाले ऑटर एयरक्राफ्ट और चेतक हेलीकॉप्टर को स्ट्राइक मशीन में बदला गया। उन्हें इम्प्रोवाइज्ड रॉकेट, हथियार और हाथ से बने साइट्स से लैस किया गया।
डॉक्यूमेंट्री में बोयरा की ऐतिहासिक डॉगफाइट और दिसंबर 1971 में नारायणगंज और चटगांव तेल डिपो पर किलो फ्लाइट के साहसिक हमलों को फिर से दिखाया गया। दासगुप्ता ने कहा, “कम से कम उपकरणों और ज़्यादा से ज़्यादा जोखिम के साथ उड़ान भरते हुए एयरमैनों ने केवल साहस, कंपास और दृढ़ विश्वास पर भरोसा किया। यह इतिहास उन गुमनाम जांबाजों की याद दिलाता है, जो कभी सुर्खियों में नहीं आए।”