शुभेंदु अधिकारी  
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संघर्ष से सत्ता के शिखर तक शुभेंदु का ‘ऐतिहासिक’ सफर

नंदीग्राम का 'सेनापति' अब बंगाल का मुख्यमंत्री

कोलकाता: राज्य में राजनीतिक सत्ता परिवर्तन का अध्याय पूरा हो चुका है। लंबे इंतजार और तीखी राजनीतिक बहसों के बाद पश्चिम बंगाल में सत्ता की कमान भाजपा के हाथों में आ गई है। इस नई सरकार के नेतृत्वकर्ता तथा मुख्यमंत्री के रूप में नंदीग्राम-भवानीपुर के विधायक शुभेंदु अधिकारी आज शपथ लेने जा रहे हैं। वर्ष 2007 के नंदीग्राम भूमि रक्षा आंदोलन की धरती से शुरू होकर राज्य के शीर्ष प्रशासनिक पद तक उनकी यह यात्रा बंगाल की राजनीति के इतिहास में एक रोमांचक और अभूतपूर्व अध्याय के रूप में देखी जा रही है। राजनीतिक हलकों का मानना है कि आज शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में राज्य में नए युग की शुरुआत हो रही है।

छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर

पूर्व मेदिनीपुर के कांथी के एक राजनीतिक परिवार में 1970 में जन्मे शुभेंदु अधिकारी के पिता वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शिशिर अधिकारी हैं। बचपन से ही उनके जीवन में राजनीति गहराई से जुड़ी रही। शुभेंदु ने अपनी प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा मेदिनीपुर के कांथी हाई स्कूल से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने कांथी के प्रभात कुमार कॉलेज (विद्यासागर विश्वविद्यालय से संबद्ध) से बी.ए. की डिग्री हासिल की। उच्च शिक्षा के लिए वे कोलकाता पहुंचे और रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातकोत्तर (एम.ए.) की डिग्री प्राप्त की। 1989 में छात्र परिषद से उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। 1995 में कांथी नगरपालिका के पार्षद बनकर वे पहली बार जनप्रतिनिधि बने। इसके बाद 1998 में वे तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में शामिल हुए और मिदनापुर क्षेत्र में पार्टी के मजबूत संगठनकर्ता के रूप में उभरकर सामने आए। 2006 में वे कांथी दक्षिण से पहली बार विधायक चुने गए।

नंदीग्राम आंदोलन बना टर्निंग पॉइंट

2007 का नंदीग्राम आंदोलन उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हुए इस आंदोलन में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई और ‘भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति’ के तहत आंदोलन का नेतृत्व किया। इस संघर्ष ने उन्हें राज्य राजनीति में एक मजबूत और प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित कर दिया। इसके बाद 2009 और 2014 में वे तमलुक से सांसद चुने गए। 2016 में नंदीग्राम से विधायक बनने के बाद उन्होंने राज्य सरकार में परिवहन, पर्यावरण और सिंचाई जैसे महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व संभाला।

टीएमसी से भाजपा तक का सफर

2020 के अंत में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। यह निर्णय राज्य की राजनीति में एक बड़े उलटफेर के रूप में देखा गया। 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम से तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कड़ी टक्कर देकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की और ‘जायंट किलर’ कहलाए। इसके बाद वे विधानसभा में विपक्ष के नेता बने और लगातार राज्य सरकार के खिलाफ सक्रिय भूमिका निभाते रहे। 2026 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम के साथ-साथ भवानीपुर सीट पर भी बड़ी जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक पकड़ को और मजबूत किया।

सत्ता के शिखर पर नया अध्याय

अब पार्टी नेतृत्व द्वारा उन्हें मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिससे उनकी राजनीतिक यात्रा एक नए और ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंच गई है। नंदीग्राम की धूल भरी गलियों से शुरू हुआ यह सफर आज राज्य के सर्वोच्च प्रशासनिक पद तक पहुंचकर एक पूर्ण राजनीतिक वृत्त की तरह दिखाई देता है—जहां आंदोलन भी था, संघर्ष भी था और अब सत्ता का शिखर भी।

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