नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल के सरकारी मान्यता प्राप्त मदरसों में शिक्षक और गैर-शिक्षक कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और ए.जी. मसीह की पीठ ने इस मामले में दायर सभी 361 याचिकाओं को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि किसी भी याचिका में ऐसा कोई आधार नहीं है, जिससे नियुक्तियों को वैध ठहराया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पहले 361 में से 13 याचिकाकर्ताओं के मामलों को परीक्षण के लिए चुना था। अदालत ने कहा था कि यदि इन 13 मामलों में याचिकाकर्ता अपने पक्ष को साबित कर पाए, तभी बाकी मामलों पर भी विचार किया जाएगा।
सोमवार को फैसला सुनाते हुए पीठ ने कहा कि 13 में से कोई भी याचिकाकर्ता अदालत को संतुष्ट नहीं कर सका, इसलिए केवल इन 13 ही नहीं बल्कि सभी 361 याचिकाएं खारिज की जाती हैं।
विवाद की शुरुआत पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा आयोग अधिनियम, 2008 से हुई थी। इस कानून के तहत राज्य के मान्यता प्राप्त मदरसों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए एक वैधानिक आयोग बनाया गया था।
साल 2014 में कलकत्ता हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इस कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। बाद में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी और 2020 में अंतिम फैसले में 2008 के कानून को वैध घोषित कर दिया।
जब मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित था, तब 2015 से 2020 के बीच मदरसों में बड़ी संख्या में शिक्षक और गैर-शिक्षक कर्मचारियों की नियुक्तियां हुईं। इन्हीं नियुक्तियों की वैधता को चुनौती देते हुए याचिकाएं दाखिल की गई थीं।
साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति गठित कर इन नियुक्तियों की जांच कराई। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस अवधि में हुई नियुक्तियां वैध नहीं थीं। इसी रिपोर्ट को चुनौती देते हुए 361 याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
अब सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले में आगे अलग से किसी अन्य याचिका पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है।