केंद्र से मांगा जवाब
पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे। कृष्णा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने दलीलें रखीं। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह स्पष्ट किया कि वह ‘राष्ट्रीय गीत’ के रूप में ‘वंदे मातरम्’ की स्थिति पर विवाद खड़ा करने के बजाय मुख्य रूप से इस सवाल की जांच कर सकता है कि इसके संबंध में आपराधिक दंड का प्रावधान संविधान में मिले मौलिक अधिकारों के अनुरूप है या नहीं?
सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में किसी गीत या प्रतीक का चयन करना निर्वाचित सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय है। अदालत का मुख्य सवाल यह है कि क्या किसी नागरिक को धार्मिक या अंतरात्मा से जुड़े आधार पर राष्ट्रीय गीत नहीं गाने के लिए आपराधिक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पीठ ने कहा कि वह इस बात की समीक्षा कर सकता है कि राष्ट्रीय गीत के संबंध में मान्यता दिए जाने के बाद उसके साथ आपराधिक परिणाम जोड़ना संवैधानिक रूप से उचित है या नहीं।
विवाद का एक प्रमुख हिस्सा Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 में 2026 में किए गए संशोधन से जुड़ा है। संशोधन के बाद कानून के संबंधित प्रावधान में राष्ट्रीय गीत को भी शामिल किया गया।
संशोधित प्रावधान के तहत यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकता है अथवा ऐसे गायन में जुटी सभा में व्यवधान पैदा करता है, तो उसे तीन वर्ष तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। इससे पहले इसी दंडात्मक सुरक्षा का प्रावधान मुख्य रूप से राष्ट्रगान से संबंधित था।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, संशोधित कानून का प्रत्यक्ष दंड उस व्यक्ति के लिए है जो जानबूझकर राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकता है या गायन कर रही सभा में व्यवधान डालता है। इसका अर्थ अपने आप यह नहीं है कि कानून का प्रत्येक प्रावधान हर नागरिक को व्यक्तिगत रूप से छह अंतरे गाने के लिए बाध्य करता है।
यही अंतर अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष संवैधानिक बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
टी. एम. कृष्णा की याचिका केवल दंडात्मक प्रावधान तक सीमित नहीं है। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्रालय के उन निर्देशों को भी चुनौती दी है जिनमें राष्ट्रीय गीत के लिए पूरे छह अंतरों वाले आधिकारिक संस्करण के इस्तेमाल की बात कही गई है।
LiveLaw के अनुसार, याचिका में गृह मंत्रालय के 28 जनवरी 2026 और 9 जुलाई 2026 के निर्देशों का उल्लेख किया गया है। याचिका का दावा है कि इन निर्देशों में छह अंतरों वाले संस्करण को आधिकारिक संस्करण के रूप में निर्धारित किया गया और कुछ सरकारी, औपचारिक तथा सांस्कृतिक अवसरों पर सामूहिक गायन से संबंधित प्रोटोकॉल तय किया गया।
‘वंदे मातरम्’ मूल रूप से बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना है। विवाद मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि इसके शुरुआती हिस्से और बाद के अंतरों की धार्मिक अभिव्यक्तियों को संवैधानिक रूप से किस तरह देखा जाए।
याचिका में कृष्णा की ओर से दावा किया गया है कि बाद के अंतरों में हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भ आते हैं। उनका तर्क है कि यदि इन हिस्सों को किसी व्यक्ति के लिए अनिवार्य रूप से गाने की स्थिति पैदा होती है, तो यह धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न उठाता है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये याचिकाकर्ता की संवैधानिक दलीलें हैं; इन दलीलों की अंतिम वैधता पर सुप्रीम कोर्ट ने अभी फैसला नहीं दिया है।
कृष्णा की याचिका में संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 से जुड़े अधिकारों का हवाला दिया गया है।
अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को कुछ सामूहिक धार्मिक अधिकार प्रदान करता है।
याचिका का मूल संवैधानिक सवाल यह है कि यदि किसी राष्ट्रीय गीत के कुछ हिस्सों में किसी विशेष धार्मिक परंपरा या देवी-देवताओं का उल्लेख माना जाता है, तो क्या किसी व्यक्ति को अपने धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा के आधार पर उसे गाने से इनकार करने पर दंडित किया जा सकता है।
इस मामले में 1986 का सुप्रीम कोर्ट का Bijoe Emmanuel फैसला विशेष महत्व रखता है। उस मामले में अदालत ने ऐसे छात्रों के पक्ष में फैसला दिया था जिन्होंने अपने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान गाने से इनकार किया था, हालांकि वे उसके दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहे थे।
मौजूदा सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इसी पुराने फैसले को ध्यान में रखने की बात कही। LiveLaw के अनुसार, अदालत ने मौखिक रूप से संकेत दिया कि ‘बिजो एमैनुएल’ अभी भी कानून का हिस्सा है और अंतरात्मा के आधार पर आपत्ति करने वाले व्यक्ति के अधिकारों का सवाल महत्वपूर्ण रहेगा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह संकेत नहीं दिया कि वह ‘वंदे मातरम्’ की राष्ट्रीय गीत के रूप में स्थिति को तय करने जा रही है। इसके बजाय पीठ ने राष्ट्रीय प्रतीक से संबंधित राज्य की पसंद और उस प्रतीक के पालन को आपराधिक दंड से जोड़ने के बीच अंतर पर ध्यान केंद्रित किया।
हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय प्रतीकों के चयन और उनसे जुड़ी आकांक्षाओं का निर्धारण निर्वाचित सरकार के क्षेत्र में आता है, जबकि किसी नागरिक के खिलाफ आपराधिक परिणाम लागू करने का प्रश्न न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है।
छह अंतरों वाले ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर इससे पहले भी अदालतों में याचिकाएं दाखिल हुई हैं।
मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार किया था। उस समय अदालत के सामने यह बात आई थी कि संबंधित सरकारी निर्देश में ‘may’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया गया था और उस समय ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाने पर कोई दंडात्मक प्रावधान मौजूद नहीं था।
इसके बाद 2026 में कानून में संशोधन कर राष्ट्रीय गीत को दंडात्मक प्रावधान के दायरे में लाया गया। इसी बदलाव के बाद वर्तमान याचिका में संवैधानिक सवाल अधिक सीधे तौर पर सामने आया है।
‘वंदे मातरम्’ के अंतरों को लेकर विवाद केवल सुप्रीम कोर्ट तक सीमित नहीं है। कर्नाटक में राज्य सरकार ने सरकारी कार्यक्रमों के संदर्भ में पहले दो अंतरों के गायन से संबंधित निर्देश जारी किए हैं, जबकि केंद्र के निर्देश पूरे छह अंतरों वाले संस्करण को आधिकारिक संस्करण के रूप में देखते हैं।
इस मुद्दे पर कर्नाटक हाईकोर्ट में भी याचिका दाखिल हुई है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, केंद्र के निर्देशों और राज्य के दो-अंतरा प्रोटोकॉल के बीच टकराव को लेकर अलग कानूनी चुनौती भी सामने आई है।
संसद में भी हुआ था कानून में संशोधन
2026 के मानसून सत्र में संसद ने Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Act, 2026 से संबंधित संशोधन पारित किया। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद राष्ट्रीय गीत को भी उस कानून के दंडात्मक दायरे में शामिल किया गया।
संशोधित कानून के तहत राष्ट्रीय गीत या राष्ट्रगान के गायन को जानबूझकर रोकना अथवा गायन कर रही सभा में व्यवधान डालना दंडनीय बनाया गया है। अधिकतम सजा तीन वर्ष तक कारावास, जुर्माना या दोनों है।
याचिका में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता का तर्क
कृष्णा की याचिका में संशोधन को चुनौती देते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता से जुड़े संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं।
याचिका का तर्क है कि छह अंतरों वाले संस्करण को सरकारी कार्यक्रमों में निर्धारित करने और इसके साथ दंडात्मक सुरक्षा जोड़ने से ऐसी स्थिति बन सकती है जिसमें कोई व्यक्ति अपने धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा के आधार पर गीत के कुछ हिस्सों का गायन न करना चाहे, लेकिन फिर भी उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का जोखिम पैदा हो।
इन दलीलों पर अंतिम निर्णय अभी सुप्रीम कोर्ट को करना है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद केंद्र सरकार का जवाब इस मामले में महत्वपूर्ण होगा। अदालत यह देख सकती है कि संशोधित कानून का उद्देश्य वास्तव में क्या है, ‘गायन रोकने’ या ‘सभा में व्यवधान’ जैसे शब्दों की कानूनी सीमा क्या है और इन प्रावधानों का अंतरात्मा तथा धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों के साथ किस तरह संबंध बनता है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने यह तय नहीं किया है कि छह अंतरों का गायन असंवैधानिक है या दंडात्मक प्रावधान असंवैधानिक है। मामला अभी न्यायिक विचार के चरण में है।
इस मामले में आगे संवैधानिक रूप से कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आ सकते हैं:
क्या किसी नागरिक को राष्ट्रीय गीत के गायन में व्यक्तिगत रूप से भाग लेने के लिए बाध्य किया जा सकता है?
यदि कोई व्यक्ति धार्मिक या अंतरात्मा के आधार पर नहीं गाता, तो क्या उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है?
‘जानबूझकर गायन रोकने’ और स्वयं गीत न गाने के बीच कानूनी अंतर क्या है?
क्या राष्ट्रीय गीत के छह अंतरों को सरकारी आदेश के माध्यम से आधिकारिक संस्करण के रूप में निर्धारित किया जा सकता है?
क्या ऐसे निर्देश संविधान के अनुच्छेद 19, 25 और 26 में मिले अधिकारों को प्रभावित करते हैं?
1986 के ‘Bijoe Emmanuel’ फैसले के सिद्धांत मौजूदा कानून पर किस हद तक लागू होंगे?
क्या राष्ट्रीय प्रतीक को सम्मान देने की जिम्मेदारी और व्यक्तिगत अंतरात्मा की स्वतंत्रता के बीच कोई संवैधानिक सीमा निर्धारित की जा सकती है?
इन सवालों पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने के बाद ही मौजूदा कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।
फिलहाल उपलब्ध न्यायिक घटनाक्रम के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने टी. एम. कृष्णा की याचिका में उठाए गए दंडात्मक पहलू पर केंद्र का पक्ष जानने की प्रक्रिया शुरू की है। अदालत ने राष्ट्रीय गीत के रूप में ‘वंदे मातरम्’ की स्थिति को इस सुनवाई का मुख्य विवाद नहीं बनाया है।
इसलिए मौजूदा मामले को ‘सुप्रीम कोर्ट ने छह अंतरे गाने को असंवैधानिक घोषित कर दिया’ के रूप में देखना सही नहीं होगा। अदालत ने अभी ऐसा कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। फिलहाल मुख्य संवैधानिक प्रश्न यह है कि राष्ट्रीय गीत से संबंधित आपराधिक दंडात्मक प्रावधान व्यक्तिगत अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों के साथ किस तरह संतुलित किए जाएं।