लखीमपुर खीरी हिंसा मामले की सुनवाई कर रहे न्यायिक अधिकारी पर गंभीर आरोप
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 2021 के लखीमपुर खीरी हिंसा मामले की सुनवाई कर रहे एक न्यायिक अधिकारी के आचरण को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से रिपोर्ट तलब की है।
प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना के पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से आरोपों की जांच करने, आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने और इसके बाद सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश करने को कहा है।
लखीमपुर खीरी हिंसा मामले के एक प्रत्यक्षदर्शी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सुनवाई के दौरान संबंधित न्यायिक अधिकारी के आचरण पर गंभीर सवाल उठाए।
उन्होंने आरोप लगाया कि न्यायिक अधिकारी ने कई एनडीपीएस (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस) तथा एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम से जुड़े मामलों को अपने पास स्थानांतरित कराया और बाद में आरोपितों को जमानत दी या उन्हें बरी कर दिया।
हालांकि, ये आरोप फिलहाल याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में रखे गए आरोप हैं। इनकी पुष्टि या खंडन का निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर नहीं दिया है।
प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल की तबीयत खराब थी और इसी कारण वह अदालत में उपस्थित नहीं हो सके। इसके बावजूद संबंधित न्यायिक अधिकारी ने उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी कर दिया।
भूषण ने न्यायिक अधिकारी के आचरण पर आपत्ति जताते हुए अदालत के समक्ष कहा कि मामले में न्यायिक प्रक्रिया को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हुई हैं।
उन्होंने यह भी दावा किया कि संबंधित अधिकारी ने ऐसे मामलों को अपने पास स्थानांतरित कराया, जिन्हें कानून के तहत उनके द्वारा स्वयं के पास स्थानांतरित नहीं किया जा सकता था।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह आरोप लगाया गया कि संबंधित न्यायिक अधिकारी ने एनडीपीएस एक्ट और एससी/एसटी एक्ट से जुड़े मामलों को अपने न्यायालय में स्थानांतरित कराया।
इसके बाद इन मामलों में आरोपितों को जमानत मिलने या उनके बरी होने का भी दावा किया गया। इस आरोप की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के संज्ञान में भेजा है और उनसे आरोपों पर गौर करने तथा आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई के बाद रिपोर्ट देने को कहा है।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष को लेकर भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा सामने आया।
प्रशांत भूषण ने दावा किया कि मुकदमे की सुनवाई के बीच सरकारी अभियोजक को बदल दिया गया और नए अभियोजक के पास महज चार महीने का अनुभव है।
याचिकाकर्ता की ओर से इस बदलाव को लेकर भी चिंता जताई गई और कहा गया कि इतने संवेदनशील मामले की सुनवाई के लिए पर्याप्त अनुभव रखने वाले अभियोजक की आवश्यकता है।
पीठ ने इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश सरकार को भी निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा कि वह ऐसे वरिष्ठ सरकारी अभियोजक की तलाश करे, जिसे सत्र अदालत में मुकदमों की कार्यवाही का पर्याप्त अनुभव हो।
राज्य सरकार को इस संबंध में अपनी स्थिति दो सप्ताह के भीतर सुप्रीम कोर्ट को बताने का निर्देश दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की है।
इस दौरान इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की रिपोर्ट और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से वरिष्ठ अभियोजक के संबंध में दी जाने वाली जानकारी मामले की आगे की सुनवाई में महत्वपूर्ण हो सकती है।
लखीमपुर खीरी हिंसा: क्या हुआ था?
लखीमपुर खीरी हिंसा की घटना 3 अक्टूबर 2021 को उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के तिकुनिया इलाके में हुई थी।
उस समय किसान तत्कालीन उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के क्षेत्र के दौरे के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा में आठ लोगों की मौत हुई थी। मृतकों में चार किसान भी शामिल थे।
घटना के दौरान एक एसयूवी द्वारा चार किसानों को कथित तौर पर कुचल दिए जाने का आरोप लगा था।
इसके बाद स्थिति और बिगड़ गई। आक्रोशित भीड़ ने एक चालक और भारतीय जनता पार्टी के दो कार्यकर्ताओं की कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या कर दी। हिंसा में एक पत्रकार की भी मौत हुई थी।
इस घटना के बाद पूरे देश में राजनीतिक और कानूनी स्तर पर व्यापक प्रतिक्रिया हुई और मामले की जांच तथा मुकदमे की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में भी रही।
आशीष मिश्रा मामले में अब तक क्या हुआ?
लखीमपुर खीरी हिंसा के मुख्य मामले में दिसंबर 2023 में निचली अदालत ने आशीष मिश्रा और 12 अन्य आरोपितों के खिलाफ आरोप तय किए थे। इन आरोपों में हत्या, आपराधिक साजिश और अन्य संबंधित अपराध शामिल हैं। आरोप तय होने के बाद मामले में नियमित ट्रायल आगे बढ़ने का रास्ता साफ हुआ था।
सुप्रीम कोर्ट ने 6 अगस्त को लखीमपुर खीरी हिंसा मामले के मुख्य आरोपी आशीष मिश्रा की जमानत की शर्तों में और ढील देने से इनकार कर दिया था।
मौजूदा सुनवाई हालांकि अलग पहलू से जुड़ी है। इसमें मुख्य सवाल मामले की सुनवाई कर रहे न्यायिक अधिकारी के कथित आचरण, अभियोजन व्यवस्था और मुकदमे की निष्पक्ष एवं उचित प्रक्रिया से संबंधित उठाए गए मुद्दों का है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने अब तीन बड़े सवाल
मौजूदा सुनवाई में कई महत्वपूर्ण मुद्दे सामने आए हैं:
संबंधित न्यायिक अधिकारी पर लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है?
क्या मामलों को संबंधित अधिकारी के न्यायालय में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी?
क्या संवेदनशील लखीमपुर खीरी मामले में पर्याप्त अनुभव रखने वाले सरकारी अभियोजक की नियुक्ति आवश्यक है?
इन सवालों पर आगे की कार्रवाई इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की रिपोर्ट और उत्तर प्रदेश सरकार की प्रतिक्रिया के बाद स्पष्ट हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को आरोपों पर गौर करने और आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई के बाद अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में देने को कहा है।
इससे फिलहाल यह स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों को अंतिम रूप से सही नहीं माना है, बल्कि उनकी जांच और प्रशासनिक स्तर पर समीक्षा के लिए हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से रिपोर्ट मांगी है।
2021 की हिंसा से जुड़े मामले में पहले से ही आरोप, जमानत, ट्रायल और अभियोजन से जुड़े कई कानूनी पहलू सुप्रीम कोर्ट के सामने आ चुके हैं।
अब न्यायिक अधिकारी के कथित आचरण और सरकारी अभियोजक की नियुक्ति को लेकर उठे सवालों के कारण मामले की अगली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी।
अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी, जब सुप्रीम कोर्ट के सामने हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की रिपोर्ट और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दी गई जानकारी आने की उम्मीद है।