समय का मापन : सौरचक्र से आधुनिक घड़ी तक 
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समय के साथ बदल रही हैं घड़ियां!

आधुनिक समय प्रणालियों में ‘सेकंड’ की परिभाषा भी ‘बदली’

Lokendra Bahuguna

लॉस एंजिलिस : आप जानते होंगे कि हर चार साल में फरवरी में एक दिन अतिरिक्त होता है। इस साल को लीप ईयर (अधि वर्ष) कहते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पृथ्वी को सूर्य का एक चक्कर लगाने में लगभग 365 दिन और छह घंटे लगते हैं। अगर हर चार साल में एक दिन नहीं बढ़ाया जाये, तो मौसमों के शुरू होने की तारीखें धीरे-धीरे बदलने लगेंगी।

खगोलीय गणना से समय का निर्धारण

पृथ्वी के घूमने को समय का आधार बनाना बंद

हजारों वर्षों से एक दिन को पृथ्वी के अपनी धुरी पर एक पूरा चक्कर लगाने के समय के रूप में परिभाषित किया जाता रहा है। लेकिन पृथ्वी के घूमने की गति पूरी तरह एक जैसी नहीं रहती। समय को अधिक सटीक तरीके से मापने के लिए आधुनिक समय प्रणालियों में पृथ्वी के घूमने को समय का आधार बनाना बंद कर दिया गया है। इस बदलाव के कारण एक सेकंड की पुरानी परिभाषा और आज की परिभाषा के बीच अंतर पैदा हो गया।

लीप सेकंड की अहमियत

कई वर्षों के दौरान आधुनिक समय प्रणालियों और पृथ्वी की गति के बीच कुछ सेकंड का अंतर आ सकता है। इस समस्या को दूर करने के लिए समय की गणना करने वाले विशेषज्ञ ‘लीप सेकंड’ का इस्तेमाल करते हैं। जिस तरह अधि वर्ष हमारे कैलेंडर को सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की परिक्रमा के हिसाब से सही रखता है, उसी तरह लीप सेकंड घड़ियों के समय को पृथ्वी के दैनिक घूर्णन की गति के साथ तालमेल में रखता है।

इस महीने बदल सकती है लीप सेकंड जोड़ने की अपनी नीति

लेकिन अक्टूबर 2026 में समय की गणना से जुड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन लीप सेकंड जोड़ने की अपनी नीति बदल सकते हैं। अंतरिक्ष विज्ञान के शोधकर्ता जानते हैं कि भौतिकी के शोध में समय को मापना कितना महत्वपूर्ण है। समय मापने के तरीकों में बदलाव के साथ भौतिक विज्ञानियों के माप भी अधिक सटीक हुए हैं। मनुष्य समय मापने के लिए जिन प्रणालियों का इस्तेमाल करता है, उनमें पिछले कुछ सौ वर्षों में बदलाव आया है। चौबीस घंटे के दिन की शुरुआत दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में प्राचीन मिस्र में मानी जाती है। उस समय दिन और रात, दोनों को 12-12 हिस्सों में बांटा जाता था। साल के दौरान दिन और रात की अवधि बदलती रहती है, इसलिए दिन के हर घंटे और रात के हर घंटे की अवधि भी अलग-अलग होती थी। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में यूनानी खगोलशास्त्री हिप्पार्कस ने खगोलीय गणनाओं के लिए 24 बराबर घंटों वाली प्रणाली अपनायी।

सूर्य घड़ी और 60 का आंकड़ा

क्यों समय को ‘60’ में बांटा?

एक घंटे को 60 मिनट और हर मिनट को 60 सेकंड में बांटने की व्यवस्था की जड़ें भी खगोल विज्ञान में हैं। साठ के आधार वाली इस प्रणाली की शुरुआत मेसोपोटामिया की सुमेरियन और बेबीलोनियाई सभ्यताओं से हुई थी। संख्या 60 खास तौर पर सुविधाजनक है, क्योंकि इसे कई छोटी संख्याओं से बिना शेष के विभाजित किया जा सकता है। यूनानी खगोलशास्त्री क्लॉडियस टॉलेमी ने करीब 150 ईस्वी में ग्रहों की गति मापते समय 60 के आधार वाली इस प्रणाली को अपनाया। उन्होंने कोण की हर डिग्री को 60 हिस्सों में और फिर इनमें से हर हिस्से को 60 छोटे हिस्सों में बांटा। 

इस तरह बने ‘मिनट’ और ‘सेकंड’ शब्द

बाद में लैटिन भाषा में इन हिस्सों को ‘पार्तेस मिनुटाए प्रिमाए’ यानी ‘पहले छोटे हिस्से’ और ‘पार्तेस मिनुटाए सेकुंडाए’ यानी ‘दूसरे छोटे हिस्से’ कहा गया। इसी प्रणाली से आगे चलकर ‘मिनट’ और ‘सेकंड’ शब्द बने। कई सदियों बाद जब यांत्रिक घड़ियां अधिक सटीक होने लगीं, तो खगोल विज्ञान में इस्तेमाल होने वाले इन विभाजनों को समय मापने के लिए भी अपना लिया गया। टॉलेमी और उनके बाद के विद्वानों की प्रणालियों के आधार पर एक औसत सौर दिन को 24 घंटे, हर घंटे को 60 मिनट और हर मिनट को 60 सेकंड में बांटा गया। इस तरह एक दिन में कुल 86,400 सेकंड होते हैं।

पैंडुलम घड़ी से बदला जमाना

1657 में आयी पेंडुलम वाली घड़ी

हालांकि समय को सही-सही मापना तभी संभव हुआ जब क्रिस्टियान हाइगेंस ने 1657 में पेंडुलम वाली घड़ी का आविष्कार किया। इस घड़ी में एक पेंडुलम लटकता रहता है और नियमित गति से दायें-बायें होता रहता है। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में होने वाले अंतर को ध्यान में रखा जाये, तो समान लंबाई वाले सभी पेंडुलम एक तरफ से दूसरी तरफ होने में बराबर समय लेते हैं। इस तरीके से समय मापने का एक मानक स्थापित हुआ। पेंडुलम वाली घड़ी की तरह विज्ञानियों ने अगले तीन सौ वर्षों तक ऐसी प्रणालियां विकसित करने पर काम किया, जिनसे समय को सटीक और एक समान तरीके से मापा जा सके। इसका उद्देश्य यह था कि दुनिया भर की सभी घड़ियां एक ही समय बतायें। इस प्रक्रिया में एक सेकंड की परिभाषा कई बार बदली गयी। आखिरकार विज्ञानिकों ने सीजियम परमाणु के आधार पर इसका समाधान खोजा।

पहली बार जुड़ सकता है नकारात्मक लीप सेकंड

साल 2022 में भार और माप पर सामान्य सम्मेलन में फैसला लिया गया था कि UTC और UT1 के बीच अधिकतम अंतर को 2035 तक या उससे पहले बढ़ाया जाना चाहिए। इसकी अधिकतम सीमा क्या होगी, इस पर 2026 की बैठक में सहमति बनाने की योजना थी। इस फैसले को जल्द लेने की एक वजह यह है कि करीब 2015 से पृथ्वी असामान्य रूप से तेज गति से घूम रही है। अगर पृथ्वी इसी तरह तेज गति से घूमती रही, तो समय की गणना करने वाले विशेषज्ञों को भविष्य में पहली बार नकारात्मक लीप सेकंड जोड़ना पड़ सकता है। इससे निपटने के लिए कंप्यूटर प्रणालियों के पास कोई बड़े स्तर का पिछला अनुभव नहीं है। इसी कारण यह मुद्दा अब अधिक जरूरी हो गया है।

13-15 अक्टूबर के सम्मेलन में हो सकता है विचार

भार और माप पर सामान्य सम्मेलन की बैठक 13 से 15 अक्टूबर 2026 तक होगी। इसमें एक मसौदा प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है, जिसके तहत 20 मई 2027 से UTC को लगातार चलने वाली समय प्रणाली बनाया जायेगा और उसमें अचानक लीप सेकंड जोड़ने की व्यवस्था खत्म कर दी जायेगी।

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