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भगवान राम की नगरी में आरएसएस के घोष वादकों का “श्रीरामार्चनम्”

अयोध्या में संघ के घोष वादकों का अनुशासनबद्ध पथ संचलन

Bishakhaa Tiwari

सर्जना शर्मा

भगवान श्री राम की धरती अयोध्या में रविवार को एक अनुपम दृश्य दिखायी दिया। सरयू नदी के तट से श्री राम जन्मभूमि मंदिर तक संघ के स्वयंसेवकों ने पथ संचलन किया। संघ की युनिफॉर्म ( गणवेश ) में वे घोष की थाप पर कदम ताल करते हुए जब वे आगे बढ रहे थे तो श्रद्धा, समर्पण और राष्ट्र भावना एक साथ सजीव हो रही थी। “श्रीरामार्चनम्” नामक विशेष प्रस्तुति के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दिल्ली प्रांत के घोष वादक दल ने सरयू नदी के तट से प्रभु श्रीराम के दरबार तक अनुशासनबद्ध पथ संचलन करते हुए वातावरण को भक्ति और संगीत से सराबोर कर दिया।

एक समान गणवेश में सजे वादकों के कदम जब एक ही ताल पर उठते, तो ऐसा प्रतीत होता मानो लय स्वयं उनके साथ चल रही हो। भारतीय शास्त्रीय रागों पर आधारित स्वरलहरियाँ हवा में घुलकर पूरे वातावरण को अलौकिक बना रही थीं। अयोध्या वासियों के लिए यह दृश्य अत्यंत आकर्षक और भाव विभोर कर देने वाला था—लोग मार्ग के दोनों ओर खड़े होकर इस अद्भुत समन्वय को निहार रहे थे।

वीणा चौक पर पहुंचते ही रागों के भाव परिवर्तित हुए और यहां बलिदानी कारसेवकों तथा स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर को स्वरांजलि अर्पित की गई। इसके पश्चात घोष दल हनुमानगढ़ी पहुंचा, जहां पवनपुत्र का अभिनंदन किया गया। रामपथ पर लगभग दस मिनट का स्थिर वादन कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रहा, जिसमें अनुशासन और संगीत का अनुपम संतुलन दिखाई दिया।

वादकों के हाथों में शंख, शृंग, बांसुरी और आनक( छोटा ड्रम ) जैसे पारंपरिक वाद्य थे, जिनकी ध्वनियाँ भारतीय सांगीतिक परंपरा की गरिमा को जीवंत कर रही थीं। प्रत्येक रचना निर्धारित ताल और शास्त्रीय रागों पर आधारित थी, जिससे प्रस्तुति में गंभीरता और सौंदर्य दोनों का संगम दृष्टिगोचर हुआ। “जयस्तुते”, “राम स्तुति”, “राम भक्त ले चला रे राम की निशानी” और “श्रीराम चंद्रकृपालु भजमन्” जैसी घोष रचनाओं ने वातावरण को प्रेरणादायी और भक्तिमय बना दिया।

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य द्वार पर “श्रीरामार्चनम्” की मुख्य प्रस्तुति दी गई। लगभग 45 मिनट तक चली घोष शाखा में विभिन्न रचनाओं के वादन के बाद कार्यक्रम का समापन हुआ और वादक दल ने राम लला के दर्शन किए।

यह आयोजन केवल एक सांगीतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा, अनुशासन और सांस्कृतिक गौरव का सजीव संदेश था—एक ऐसा दृश्य जिसने यह अनुभूति कराई कि जब संगीत, साधना और श्रद्धा एक साथ मिलते हैं, तो वातावरण स्वयं दिव्य हो जाता है।

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