सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेग 
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एसआईआर में ‘आधार’ शामिल नहीं करने पर चुनाव आयोग सही : सुप्रीम कोर्ट

सुनवाई बुधवार को भी जारी, आयोग ने माना : इतनी बड़ी प्रक्रिया में कुछ गलतियां हो जाती हैं

नयी दिल्ली : बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय में मंगलवार को लंबी सुनवाई के दौरान एसआईआर में आधार और राशन कार्ड को नहीं शामिल करने पर निर्वाचन आयोग के कदम को सही ठहराते हुए कहा कि आयोग का कहना सही है कि इन दस्तावेजों को ठोस सुबूत के दौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है। आयोग ने स्वीकार किया कि इतनी बड़ी प्रक्रिया में थोड़ी खामियां रह जाती हैं, इसलिए मसौदा मतदाता सूची पर दावे-आपत्तियां मांगी गयी हैं। इस मामले पर बुधवार को आगे सुनवाई जारी रहेगी।

सिब्बल, सिंघवी और फरासत ने रखे अपने पक्ष

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची के पीठ ने एसआईआर के खिलाफ दायर याचिकाओं पर दलीलें सुनीं। याचियों की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और शादान फरासत ने अपने पक्ष रखे। सिब्बल ने आयोग के इस अभियान की प्रक्रिया पर सवाल उठाये। याचियों ने एसआईआर के तहत बिहार में 65 लाख लोगों को मतदाता सूची से बाहर करने का आरोप लगाया। सिब्बल ने आरोप लगाया कि एक छोटे से निर्वाचन क्षेत्र में 12 लोग ऐसे हैं जिन्हें मृत दिखाया गया है, लेकिन वे जीवित हैं। कुछ मृत लोगों के नाम सूची मे हैं। बीएलओ ने कोई काम नहीं किया है। इस पर आयोग ने कहा कि अभी मसौदा मतदाता सूची जारी हुई है। इतनी बड़ी प्रक्रिया में कुछ गलतियां होना स्वाभाविक है।

कोर्ट का आयोग से सवाल

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के वकील राकेश द्विवेदी से पूछा कि कितने लोगों की पहचान मृतक के रूप में हुई है। द्विवेदी ने कहा कि इतनी बड़ी प्रक्रिया में कुछ न कुछ खामियां तो होंगी हीं। सिब्बल ने कहा कि नये मतदाता को सूची में नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म 6 भरना होता है। उस फॉर्म में जन्म तारीख के लिए दस्तावेजी सुबूत की सूची में आधार कार्ड को दूसरे नंबर पर रखा गया है मगर एसआईआर में आयोग आधार को स्वीकार नहीं कर रहा है। सिब्बल ने कहा अगर कोई व्यक्ति कहता है कि मैं भारत का नागरिक हूं तो इसे सिद्ध करने की जिम्मेदारी आयोग पर है। एक नागरिक सिर्फ जानकारी दे सकता है, जिसे किसी नागरिक के भारतीय होने पर संदेह है तो सरकार को ही यह साबित करना होगा।

‘मांगे गये दस्तावेज सभी के पास नहीं’

लंच ब्रेक के बाद दोबारा शुरू हुई सुनवाई के दौरान सिब्बल ने एसआईआर की पूरी प्रक्रिया को कानून के विरूद्ध बताया। उन्होंने गणना फॉर्म का हवाला देते हुए कहा कि आयोग को ऐसा करने का अधिकार नहीं है। सिब्बल ने इस पर कहा कि अगर सिर्फ जन्म प्रमाण पत्र की बात करें, तो सिर्फ 3.06 प्रतिशत लोगों के पास ही यह दस्तावेज है। इसी तरह सिर्फ 2.7 प्रतिशत के पास पासपोर्ट और 14.71 फीसदी के पास ही मैट्रिक का सर्टिफिकेट है। जिन लोगों के पास ये दस्तावेज नहीं हैं, उनके पास आधार और राशन कार्ड है मगर आयोग उसे एसआईआर में ले नहीं रहा है।

एसआईआर को चुनौती दे रहे पक्ष

राजद सांसद मनोज कुमार झा, तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा, कांग्रेस के केसी वेणुगोपाल, राकांपा-एसपी की सुप्रिया सुले, भाकपा के डी राजा, सपा के हरेंद्र सिंह मलिक, शिवसेना (उद्धव) के अरविंद सावंत, झामुमो के सरफराज अहमद और भाकपा (माले) के दीपांकर भट्टाचार्य ने संयुक्त रूप से निर्वाचन आयोग के 24 जून के फैसले को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया है। इसके अलावा योगेंद्र यादव जैसे कार्यकर्ताओं ने आयोग के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया है।

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