डॉ. शशि पांजा  
टॉप न्यूज़

सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐतिहासिक व सराहनीय : डॉ. शशि पांजा

पांजा ने सुप्रीम कोर्ट के यूथनेशिया फैसले का किया स्वागत

कोलकाता: देश की सर्वोच्च अदालत के हालिया पेसिव यूथनेशिया यानी ‘परोक्ष स्वेच्छामृत्यु’ संबंधी ऐतिहासिक फैसले का राज्य की महिला, बाल एवं समाज कल्याण मंत्री डॉ. शशि पांजा ने स्वागत किया है। केवल राज्य मंत्रिमंडल के महत्वपूर्ण सदस्य होने के नाते नहीं, बल्कि एक प्रतिष्ठित और अनुभवी चिकित्सक होने के नाते भी उनका यह बयान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

बुधवार को सन्मार्ग के साथ एक निजी बातचीत में उन्होंने इस फैसले पर अपने सुविचारित विचार और चिकित्सकीय अनुभव साझा किए। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई यह कानूनी अनुमति मुमूर्षु रोगियों के लंबे शारीरिक कष्ट और उनके परिवारों की मानसिक पीड़ा से राहत देने में ऐतिहासिक कदम है।

डॉ. पांजा ने बताया कि भारत में एक्टिव यूथनेशिया यानी प्रत्यक्ष स्वेच्छामृत्यु पूरी तरह अवैध है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पेसिव यूथनेशिया की अनुमति देना चिकित्सकीय दृष्टिकोण से सही है। उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति ‘वेजिटेटिव स्टेट’ या ब्रेन-डेड स्थिति में हो और उसके ठीक होने की कोई संभावना न बची हो, तब केवल लाइफ सपोर्ट या वेंटिलेटर के सहारे उसे जीवित रखना अत्यंत पीड़ादायक होता है।

उन्होंने गाजियाबाद के हरीश राणा का उदाहरण देते हुए कहा कि एक 20 वर्षीय युवक, जो दुर्घटना के बाद 12 साल तक वेजिटेटिव अवस्था में रहा, उसके परिवार की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने पेसिव यूथनेशिया की अनुमति दी। लंबे समय तक मरीज को लाइफ सपोर्ट पर रखना केवल रोगी के लिए ही नहीं, बल्कि परिवार के लिए भी मानसिक और आर्थिक संकट का कारण बनता है।

डॉ. पांजा ने चेतावनी दी कि इस अत्यंत संवेदनशीलफैसले का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि आवेदन करने वाले परिवार की मंशा पूरी तरह मानवीय हो, किसी प्रकार का स्वार्थ या संपत्ति लालच न हो, और उच्चस्तरीय चिकित्सकीय बोर्ड यह सुनिश्चित करे कि रोगी के ठीक होने की कोई संभावना नहीं बची है। निर्णय लेने से पहले विभिन्न उपचारों के माध्यम से रोगी का गहन अवलोकन भी किया जाना चाहिए।

उन्होंने मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग की मर्मांतिक घटना को याद करते हुए कहा कि उस समय यदि ऐसा कानून होता तो उन्हें दशकों तक यह कष्ट नहीं सहना पड़ता। डॉ. पांजा ने अंत में कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय चिकित्सा विज्ञान और मानवाधिकारों के क्षेत्र में एक नया दृष्टिकोण खोलता है।

SCROLL FOR NEXT