नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए विधेयक को मंजूरी देने के लिए समय सीमा तय किये जाने के मामले की सुनवाई के दौरान नेपाल और बांग्लादेश में हुए तख्तापलट और हिंसक आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि हमें अपने संविधान पर गर्व है। आप देखिए कि पड़ोसी देशों नेपाल और बांग्लादेश में कैसे हालात बने हैं।
राज्यपाल केंद्र का डाकिया नहीं : एसजी
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई की अध्यक्षता वाले पांच न्यायाधीशों के संविधान पीठ ने ‘प्रेसिडेंशियल रेफरेंस’ पर सुनवाई के नौवें दिन यह टिप्पणी की। गौरतलब है कि राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए विधानसभा/ संसद द्वारा पारित विधेयक को मंजूरी देने के लिए शीर्ष न्यायालय द्वारा समय सीमा तय किये जाने पर राष्ट्रपति की ओर से रेफरेंस दाखिल किया गया है, जिस पर शीर्ष न्यायालय में सुनवाई चल रही है।
फिर दिलचस्प बहस देखने को मिली
बुधवार को एक बार फिर से इस मामले में दिलचस्प बहस देखने को मिली। सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने राज्यपालों की ओर से विधेयक रोके जाने की जानकारी दी तो वहीं कपिल सिब्बल ने कहा कि 2014 के बाद ऐसे मामले बढ़ गये हैं और उससे पहले ऐसा होता ही नहीं था। इस दौरान मेहता ने यह भी कहा कि हम पहले ही कह चुके हैं कि राज्यपाल केंद्र सरकार का एजेंट नहीं होता है।
‘मुकदमे की मंजूरी देते समय मंत्रिपरिषद की सलाह मानने का बाध्य हैं राज्यपाल ’
कांग्रेस शासित तेलंगाना सरकार ने बुधवार को संविधान पीठ के समक्ष कहा कि आमतौर पर राज्यपाल अभियोजन स्वीकृति प्रदान करने के मामले में भी मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह लेने के लिए बाध्य होते हैं, सिवाय उस स्थिति के जब कोई मंत्री या मुख्यमंत्री किसी आपराधिक मामले में शामिल हो।
राज्यपाल के ‘अंतर्निहित पूर्वग्रह’ पर भी गौर करना होगा
तेलंगाना सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता निरंजन रेड्डी ने बताया कि राष्ट्रपति को मामला भेजे जाने (प्रेसिडेंशियल रेफरेंस) पर जवाब देते समय शीर्ष न्यायालय को विधेयक पर राज्यपाल के ‘अंतर्निहित पूर्वग्रह’ पर भी गौर करना होगा। रेड्डी ने तमिलनाडु के उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि राज्यपाल ने राज्य द्वारा संचालित विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति पद से राज्यपाल को हटाने के लिए विधानसभा द्वारा पारित विधेयक पर राज्यपाल के हस्तक्षेप का हवाला दिया था। उन्होंने कहा कि अदालत को इस पर गौर करना होगा।