पाथुरियाघाटा ठाकुरबाड़ी 
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फूल-भोग-मंत्रोच्चार नहीं, यहां कला से होगी मां दुर्गा की आराधना

Paresnjitt

- 10 अक्टूबर को आनंद मेला, 18 से 20 तक आनंद उत्सव

- 21 अक्टूबर को आनंद यात्रा, कला-संस्कृति के रंग में सजेगा टैगोर पैलेस

प्रसेनजीत, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता :

शहर में दुर्गापूजा के अनगिनत रंग हैं, लेकिन पाथुरियाघाटा ठाकुरबाड़ी का दुर्गोत्सव अपनी अलग पहचान रखता है। यहां मां को न फूल चढ़ाए जाते हैं, न भोग लगाया जाता है, न पुरोहित मंत्रोच्चार करते हैं और न ही पारंपरिक कर्मकांड होते हैं। यहां देवी के चरणों में अर्पित होती है कला की अंजलि—संगीत, नृत्य, अभिनय और बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा। ऐतिहासिक टैगोर पैलेस में आयोजित यह दुर्गोत्सव पूजा से आगे बढ़कर उस विरासत को जीवंत करने की कोशिश है, जिसमें कला भी आराधना का माध्यम रही है।

लगभग ढाई सौ साल पहले, वर्ष 1780 में गोपीमोहन ठाकुर ने पाथुरियाघाटा ठाकुरबाड़ी में दुर्गोत्सव की शुरुआत की थी। लंबे समय तक यह परंपरा निर्बाध चली, लेकिन 2008 में इसमें विराम आ गया। करीब 14 वर्ष बाद, 2022 में 13-बी, प्रसन्न कुमार टैगोर स्ट्रीट स्थित टेगोर पैलेस में दुर्गोत्सव फिर शुरू हुआ। ठाकुरबाड़ी की सदस्य डॉ. सौराजा टैगोर इसके आयोजन की प्रमुख सूत्रधार हैं।

ठाकुरबाड़ी के सूत्रों के अनुसार, इस वर्ष 10 अक्टूबर को दोपहर 3 बजे से आनंद मेला आयोजित होगा। बच्चों को केंद्र में रखकर आयोजित मेले में हस्तशिल्प और खान-पान के स्टॉल के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होंगे। इसके बाद 18 से 20 अक्टूबर तक शाम 6 बजे से आनंद उत्सव और 21 अक्टूबर को दोपहर 3 बजे से आनंद यात्रा आयोजित की जाएगी। विस्तृत कार्यक्रम जल्द जारी किया जाएगा।

इस दुर्गोत्सव में देवी की प्रतिमा को पारंपरिक पूजा-पद्धति के बजाय कलाकारों की प्रस्तुतियों के माध्यम से अंजलि दी जाती है। संगीत, नृत्य, अभिनय सहित विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के लिए कलाकार महीनों तैयारी करते हैं। बच्चों और नई पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सौराजा टैगोर के अनुसार, प्रतिमा के सामने मंच इस तरह बनाया जाता है कि मां स्वयं कार्यक्रम की पहली दर्शक हों। उनका मानना है कि श्रद्धा के साथ कला के माध्यम से भी देवी तक पहुंचा जा सकता है।

बंगाल की पुरानी परंपरा में दुर्गापूजा के अवसर पर राजबाड़ियों और जमींदार घरानों में संगीत, नृत्य, काव्यपाठ और नाट्य प्रस्तुतियां होती थीं। पाथुरियाघाटा का दुर्गोत्सव उसी सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश है। टैगोर पैलेस में आयोजित यह दुर्गोत्सव सभी के लिए खुला है और प्रवेश नि:शुल्क रहेगा।

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