ईरान में भड़कते युद्ध के बीच पाकिस्तान खुद को अमेरिका और ईरान के बीच एक अहम मध्यस्थ के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा है। इस कूटनीतिक हलचल की शुरुआत तब हुई जब पाक सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बात की। इसके तुरंत बाद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन से संपर्क साधा और शांति वार्ता के लिए पाकिस्तान को मंच बनाने की पेशकश की।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान ने अमेरिका का 15-सूत्रीय शांति प्रस्ताव भी ईरान तक पहुंचाया, लेकिन तेहरान ने उसे ठुकरा दिया। तुर्की और मिस्र के साथ मिलकर पाकिस्तान बैक-चैनल डिप्लोमेसी में जुटा है, ताकि बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा संकट को रोका जा सके।
हालांकि, पाकिस्तान के लिए यह राह आसान नहीं है। अगर ईरान पीछे नहीं हटता, तो इस संघर्ष का असर सीधे उसकी सीमाओं तक पहुंच सकता है। खासकर इसलिए क्योंकि उसका सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता है—जो जरूरत पड़ने पर उसे युद्ध में खींच सकता है। पाकिस्तान के लिए दांव काफी बड़ा है। अगर वह अमेरिका और ईरान को बातचीत की मेज पर ला देता है, तो उसकी वैश्विक साख 1972 में निक्सन की चीन यात्रा जैसी ऐतिहासिक भूमिका तक पहुंच सकती है। साथ ही, वह इस युद्ध के खत्म होने से सीधे तौर पर फायदा भी उठाएगा।
लेकिन खतरे भी कम नहीं हैं। पाकिस्तान में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया आबादी रहती है, और युद्ध की शुरुआत में ही बड़े विरोध प्रदर्शन देखने को मिले थे। इसके अलावा, ईरान के साथ सटी बलूचिस्तान सीमा पहले से ही अस्थिर है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान के पास अमेरिका और ईरान—दोनों से बातचीत के रास्ते खुले हैं, जो उसे एक “विश्वसनीय मध्यस्थ” बनाते हैं। लेकिन अगर ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव बढ़ता है, तो पाकिस्तान के लिए संतुलन बनाना बेहद मुश्किल हो सकता है।