सर्जना शर्मा
पूर्वोत्तर भारत की एरी सिल्क और मध्य प्रदेश की चंदेरी एक विहंगम संगम है पद्म डोरी। पद्म भारत का राष्ट्रीय फूल कमल और डोरी जो पूरे भारत को एकता के सूत्र में बांध दे । पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव नीरज कुमार ने शुक्रवार को दिल्ली में पद्म डोरी हथकरघा प्रदर्शनी के उद्घाटन से पूर्व मीडिया को बताया कि ये भारत के बुनकरों को जोड़ने, हथकरघा कला का आदान प्रदान करने का एक अद्भुत प्रयास है। ये एक साल पहले शुरू किया गया पूर्वोत्तर भारत के बुनकरों को मध्य प्रदेश के चंदेरी भेजा गया ताकि वे एक दूसरे की कला को समझ कर साझी विरासत बना सकें। दो अलग अलग भौगोलिक क्षेत्रों के बुनकरों के बीच भाषा की दीवार थी लेकिन जैसा कि कला, गीत, संगीत किसी भाषा से बंधे नहीं होते ऐसी ही कारीगरी की भी वैश्विक भाषा है। दोनों क्षेत्रों के बुनकरों ने एक दूसरे को ताने बाने और मोटिफ के माध्यम से ऐसा समझा कि एरी और चंदेरी का बेहद खूबसूरत संगम हो गया।
ये प्रयोग किया था भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय ने मध्यप्रदेश सरकार के साथ मिल कर। पूर्वोत्तर हस्तशिल्प और हथकरघा विकास निगम और मध्य प्रदेश हथकरघा विकास निगम ने साथ मिलकर काम शुरू किया। पहले तो एरी और चंदेरी दोनों के धागों का ताना बाना बनाया गया ये भी एक चुनौती था। चंदेरी से आए बुनकर राशिद (हथकरघे पर ऐरी और चंदेरी दोनों को मिला कर पद्म डोरी बना रहे थे) ने बताया कि वे दोनों धागों को साथ रखते हैं और दोनों का पहले ताना और फिर बाना बनाते हैं। पूर्वोत्तर भारत और मध्यप्रदेश का संगम होते देखना एक सुखद अनुभूति है।
पूर्वोत्तर भारत हथकरघा और हस्तशिल्प विकास निगम के प्रबंध निदेशक मारा काचो कहते हैं ये केवल दो संस्कृतियों को ही नहीं दो अर्थ व्यवस्थाओं का भी मिलन है। पहले गुजरात के हथकरघा बुनकरों के साथ ये प्रयोग किया जा चुका है। अब मध्य प्रदेश के साथ किया जा रहा है अब परंपरा से हटकर भी काम किया जाएगा। केवल साडी और सूट ही नहीं अब चादर तकिए पर्दे कुशन आदि भी बनाए जायेंगे। इनमें पूर्वोत्तर के बेल बूटे पशु पक्षी फूल पौधे और मध्यप्रदेश का बाघ प्रिंट और मोटिफ बनाए जा रहे हैं। और सचमुच ये देखने में बहुत सुंदर लग रहे हैं। बाघ प्रिंट मध्यप्रदेश की बाघिनी नदी के किनारे हजारों साल पहले कुछ कारीगरों ने बनाए थे जो कि आज भी बहुत लोकप्रिय हैं। इनको हैंड ब्लॉक के जरिए कपड़ो पर छापा जाता है। चंदेरी में सोने और चांदी अथवा सुनहरे और रूपहले धागे से छोटी छोटी बूटियां बनायी जाती है वाघ प्रिंट के पूरे पूरे ब्लॉक भी जरी से काढ़े जाते हैं।
उधर पूर्वोत्तर भारत में तीन तरह की सिल्क है मूंगा, ऐरी और पट सिल्क मूंगा और पट को अमीरों की सिल्क और ऐरी को गरीबों की सिल्क कहा जाता है। एरी के मोटिफ मूंगा और पट के सुंदर नाजुक मोटिफ की तुलना में बड़े और ज्यादातर ज्यामितीय होते हैं। असम तिब्बत – बर्मा -मलेशिया के सिल्क रूट पर पड़ता है यहां सिल्क की परंपरा ईसा से लगभग तीन हजार वर्ष पुरानी है। पाल और अहोम राजाओं के शासन काल में सिल्क हथकरघे खूब फले फूले राजाओं में सिल्क बुनकरों के पूरे पूरे के गांव बसाए और ये परंपरा आज भी जीवित हैं ।
दिल्ली के ट्रावनकोर हाऊस में पद्म डोरी वस्त्रों की प्रदर्शनी , हथकरघे पर कारीगरों का काम एक एक डिजाइन की बारीकी को चित्र सहित समझाया गया है। ग्वालियर राजघराने के जय विलास पैलेस में भी चंदेरी की परंपरा को न केवल संरक्षण दिया जा रहा है बल्कि फ्यूजन भी किया जा रहा हैय़ जयविलास पैलेस के डिजाइनरों ने पूर्वोत्तर भारत के बुनकरों के साथ मिल कर ऐरी और चंदेरी का तराना लिखा। पद्म डोरी का एक फैशन शो भी रखा गया है। पद्म डोरी प्रदर्शनी 3 मई तक चलेगी दिल्ली वालों के लिए ये आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
पूर्वोत्तर भारत हस्तशिल्प हथकरघा विकास निगम के अधिकारियों का कहना है कि पद्म डोरी केवल एक ब्रांड नहीं होगा बल्कि पूरी दुनिया में ये भारत की विविधता को शो केस करेगा इसमें विदेशी ग्राहकों के लिए ज्यादातर हाई रेंज होगी।