सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : बंगाल के जंगलों, आर्द्रभूमियों, घास के मैदानों और यहां तक कि शहरी इलाकों में रहने वाले रहस्यमयी रात के पक्षी उल्लुओं को लेकर एक ऐतिहासिक पहल की जा रही है। भारत में पहली बार, पश्चिम बंगाल में राज्यव्यापी उल्लू सर्वेक्षण शुरू किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य राज्य भर में उल्लुओं की प्रजातियों, उनकी संख्या और वितरण का वैज्ञानिक दस्तावेज़ तैयार करना है। फिलहाल राज्य में उल्लुओं की 23 प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
यह सर्वेक्षण जनवरी से मई तक चलेगा, क्योंकि इस अवधि में उल्लुओं की गतिविधियाँ सबसे अधिक होती हैं। यह अध्ययन संरक्षित क्षेत्रों के साथ-साथ गैर-संरक्षित इलाकों में भी किया जाएगा और इसमें जंगल, आर्द्रभूमि, घास के मैदान और शहरी आवास सभी को शामिल किया गया है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को बर्डवॉचर्स सोसाइटी (BWS) द्वारा WWF-इंडिया और राज्य वन विभाग के सहयोग से अंजाम दिया जा रहा है। BWS के संस्थापक और सचिव सुजान चटर्जी ने बताया कि इस सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य बंगाल में विभिन्न आवासों में उल्लुओं की आधारभूत स्थिति, संख्या और वितरण को स्थापित करना है। उन्होंने कहा, “यह डेटा भविष्य की संरक्षण योजनाओं और दीर्घकालिक अध्ययनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा। साथ ही, हम उल्लुओं के प्रमुख घोंसले बनाने, रहने और भोजन खोजने के स्थानों की पहचान करेंगे और उनके सामने मौजूद खतरों का आकलन करेंगे, ताकि प्रभावी संरक्षण रणनीतियाँ बनाई जा सकें।
यह पहल WWF-इंडिया के रैप्टर संरक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत की जा रही है। WWF-इंडिया के रैप्टर संरक्षण कार्यक्रम के निदेशक रतुल साहा ने कहा, “उल्लू सदियों से इंसानों के साथ रहते आए हैं। वे भले ही कम दिखाई देते हों, लेकिन उनकी आवाज़ें अक्सर सुनी जाती हैं। उल्लू कीट नियंत्रण में अहम भूमिका निभाते हैं और पर्यावरण के स्वास्थ्य का संकेतक होते हैं। इसके बावजूद, आज भी हमें यह ठीक से नहीं पता कि कई प्रजातियाँ कहाँ और कितनी संख्या में पाई जाती हैं। यह सर्वेक्षण विज्ञान और स्थानीय ज्ञान—दोनों को जोड़कर इन ‘रात के पड़ोसियों’ को बेहतर तरीके से समझने में मदद करेगा। सर्वेक्षण को व्यवस्थित रूप से पूरा करने के लिए पूरे राज्य को अलग-अलग सर्वे ज़ोन में बांटा गया है। 20×20 किलोमीटर के ग्रिड-बेस्ड फ्रेमवर्क के तहत कुल 267 ग्रिड बनाए गए, जिनमें से 100 प्रतिनिधि ग्रिड (30 प्रतिशत से अधिक) का चयन किया गया। पिछले पांच वर्षों के सत्यापित ‘ईबर्ड’ रिकॉर्ड को भी ग्रिड मैपिंग में शामिल किया गया है। हर ग्रिड में कम से कम 12 फोकल पॉइंट तय किए गए हैं, जो एक-दूसरे से कम से कम 3 किलोमीटर की दूरी पर होंगे। प्रत्येक पॉइंट पर 10 से 15 मिनट तक उल्लुओं को देखा और सुना जाएगा। कॉल प्लेबैक तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा। सर्वेक्षण सूर्यास्त के बाद के चार घंटों के भीतर किया जाएगा, जब उल्लू सबसे अधिक सक्रिय होते हैं। इस दौरान उल्लू की प्रजाति, संख्या, व्यवहार, उम्र, लिंग, पंखों की स्थिति, आवास, संभावित खतरे, GPS लोकेशन और मौसम की स्थिति जैसी विस्तृत जानकारियाँ दर्ज की जाएंगी। इस सर्वेक्षण में ब्राउन फिश उल्लू, ओरिएंटल बे उल्लू और यूरेशियन स्कॉप्स उल्लू जैसी कुछ खास प्रजातियों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। यह सर्वेक्षण न केवल उल्लुओं के संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि आम लोगों को अपने “रात के पड़ोसियों” को समझने और उनके संरक्षण के प्रति जागरूक करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल है।